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Thursday, April 3, 2014
पांच साल में नौ गुनी हो गई सोनिया गांधी की संपत्ति
पांच साल में नौ गुनी हो गई सोनिया गांधी की संपत्ति
नई दिल्ली। यूपीए की चेयरपर्सन और कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी रायबरेली से चौथी बार चुनाव जीतने की उम्मीद के साथ ही एक बार फिर से चुनाव मैदान में हैं। बुधवार को जब सोनिया गांधी ने अपना नामांकन दाखिल किया तो उन्होंने अपनी संपत्ति की भी घोषणा की। सोनिया की ओर से जो शपथ पत्र दाखिल किया गया है उसके मुताबिक उनकी संपत्ति वर्तमान समय में नौ करोड़ 28 लाख रुपए की है। खास बात है कि वर्ष 2009 में उनकी ओर से दाखिल किए गए शपथ पत्र के मुताबिक उनकी संपत्ति एक करोड़ 37 लाख की थी। साफ है कि पांच वर्ष में सोनिया की संपत्ति में नौ गुना इजाफा हुआ है। बेटे राहुल को दिया लोन सोनिया गांधी की ओर से मुहैया कराई गई जानकारी के मुताबिक उनकी संपत्ति में नौ लाख रुपए की वह राशि भी शामिल है जो उन्होंने अपने बेटे राहुल को बतौर कर्ज दी हुर्इ। इस शपथ पत्र के मुताबिक उनके पास कोई भी कार नहीं है और कैश के नाम पर सिर्फ 85,000 रुपए ही हैं। इसके अलावा उनके पास इटली में 19.90 लाख रुपए संपत्ति भी है। कभी सार्वजनिक तौर पर लोगों से बचने वाली सोनिया गांधी आज देश की सबसे ताकतवर महिला के तौर पर जानी जाती हैं। सोनिया गांधी कभी सक्रिय राजनीति में इस कदर सफलता हासिल करेंगी इस बात को लेकर विशेषज्ञों को थोड़ी आशंका थी। लेकिन आज सोनिया ने भारतीय राजनीति में वह स्थान बना लिया है जिनके बिना भारतीय राजनीति की कल्पना करना बेईमानी है। एक घरेलू महिला से बनीं राजनीतिक महिला राजीव गांधी से लंदन के एक रेस्टोरेंट में मुलाकात होने के बाद वह 60 के दशक में गांधी परिवार की बहू बनीं। सोनिया ने कभी भी राजनीतिक जीवन की ओर रुख नहीं किया था। वह हमेशा ही अपने परिवार और बाकी के कार्यों में व्यस्त रहीं लेकिन राजीव गांधी की मौत के बाद उन्होंने राजनीति में अपने कदम बढ़ाने शुरू किए। वर्ष 1999 में उन्होंने लोकसभा चुनावों के जरिए राजनीति में पूरी तरह से सक्रिय हो गईं। इस वर्ष सोनिया ने कर्नाटक के बेल्लारी और उत्तर प्रदेश के अमेठी से पहला लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत भी हासिल की। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2004 में अमेठी की सीट बेटे राहुल के लिए छोड़ दी और अपना रुख रायबरेली की ओर कर लिया। सोनिया ने यहां भी जीत दर्ज की। वर्ष 2009 के चुनावों में सोनिया फिर रायबरेली से जीतकर संसद पहुंची। अब वह वर्ष 2014 के चुनावों में एक बार फिर रायबरेली की जनता के सामने हैं और उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस बार भी जनता उन्हें निराश नहीं करेगी।

जब बीमारी पर उठे कई सवाल-
नई दिल्ली। यूपीए की चेयरपर्सन और कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी रायबरेली से चौथी बार चुनाव जीतने की उम्मीद के साथ ही एक बार फिर से चुनाव मैदान में हैं। बुधवार को जब सोनिया गांधी ने अपना नामांकन दाखिल किया तो उन्होंने अपनी संपत्ति की भी घोषणा की। सोनिया की ओर से जो शपथ पत्र दाखिल किया गया है उसके मुताबिक उनकी संपत्ति वर्तमान समय में नौ करोड़ 28 लाख रुपए की है। खास बात है कि वर्ष 2009 में उनकी ओर से दाखिल किए गए शपथ पत्र के मुताबिक उनकी संपत्ति एक करोड़ 37 लाख की थी। साफ है कि पांच वर्ष में सोनिया की संपत्ति में नौ गुना इजाफा हुआ है। बेटे राहुल को दिया लोन सोनिया गांधी की ओर से मुहैया कराई गई जानकारी के मुताबिक उनकी संपत्ति में नौ लाख रुपए की वह राशि भी शामिल है जो उन्होंने अपने बेटे राहुल को बतौर कर्ज दी हुर्इ। इस शपथ पत्र के मुताबिक उनके पास कोई भी कार नहीं है और कैश के नाम पर सिर्फ 85,000 रुपए ही हैं। इसके अलावा उनके पास इटली में 19.90 लाख रुपए संपत्ति भी है। कभी सार्वजनिक तौर पर लोगों से बचने वाली सोनिया गांधी आज देश की सबसे ताकतवर महिला के तौर पर जानी जाती हैं। सोनिया गांधी कभी सक्रिय राजनीति में इस कदर सफलता हासिल करेंगी इस बात को लेकर विशेषज्ञों को थोड़ी आशंका थी। लेकिन आज सोनिया ने भारतीय राजनीति में वह स्थान बना लिया है जिनके बिना भारतीय राजनीति की कल्पना करना बेईमानी है। एक घरेलू महिला से बनीं राजनीतिक महिला राजीव गांधी से लंदन के एक रेस्टोरेंट में मुलाकात होने के बाद वह 60 के दशक में गांधी परिवार की बहू बनीं। सोनिया ने कभी भी राजनीतिक जीवन की ओर रुख नहीं किया था। वह हमेशा ही अपने परिवार और बाकी के कार्यों में व्यस्त रहीं लेकिन राजीव गांधी की मौत के बाद उन्होंने राजनीति में अपने कदम बढ़ाने शुरू किए। वर्ष 1999 में उन्होंने लोकसभा चुनावों के जरिए राजनीति में पूरी तरह से सक्रिय हो गईं। इस वर्ष सोनिया ने कर्नाटक के बेल्लारी और उत्तर प्रदेश के अमेठी से पहला लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत भी हासिल की। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2004 में अमेठी की सीट बेटे राहुल के लिए छोड़ दी और अपना रुख रायबरेली की ओर कर लिया। सोनिया ने यहां भी जीत दर्ज की। वर्ष 2009 के चुनावों में सोनिया फिर रायबरेली से जीतकर संसद पहुंची। अब वह वर्ष 2014 के चुनावों में एक बार फिर रायबरेली की जनता के सामने हैं और उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस बार भी जनता उन्हें निराश नहीं करेगी।
जब बीमारी पर उठे कई सवाल-
करीब
तीन साल पहले सोनिया गांधी को न्यूयॉर्क के केट्टरिंग कैंसर सेंटर में
इलाज के लिए भर्ती कराया गया था। बताया जाता है कि उस समय उन्हें सर्वाइकल
कैंसर डाइग्नोस हुआ था। हालांकि उनकी बीमारी को लेकर कई तरह के सवाल भी
उठे। बताया जाता है कि सोनिया गांधी के इलाज पर 1880 करोड़ रुपए का खर्च
आया था।
Read more at: http://hindi.oneindia.in/news/features/profile-of-soniya-gandhi-you-must-know-these-things-about-sonia-lse-293260.html#infinite-scroll-2
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Tuesday, April 1, 2014
आतंकवादियो के बचाव मे उतरे"आप"नेता
सीकर मे पकड़े गये आतंकवादियो के बचाव मे उतरे"आप"नेता मेजर सुरेन्द्र पूनिया
नेहरू ने सीआईए को दी थी भारतीय सैन्य अड्डे इस्तेमाल करने की इजाजत
नेहरू ने सीआईए को दी थी भारतीय सैन्य अड्डे इस्तेमाल करने की इजाजत
Aug 17, 2013, 02.23AM IST

Aug 17, 2013, 02.23AM IST
वॉशिंगटन।। भारत ने 1962 के युद्ध की पराजय के बाद चीनी क्षेत्रों को निशाना बनाने के लिए अमेरिका को सीआईए के यू-2 जासूसी विमानों में ईंधन भरने के लिए अपने एक वायुसैनिक अड्डे के इस्तेमाल की इजाजत दी थी। गोपनीय सूची से हटाए गए एक दस्तावेज से यह जानकारी मिली है।
राष्ट्रीय सुरक्षा अभिलेखागार (एनएसए) ने सीआईए से हासिल और हाल में गोपनीय सूची से हटाए गए दस्तावेजों के आधार पर तैयार एक रिपोर्ट में बताया है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 11 नवंबर 1962 को चीन के साथ लगे सीमावर्ती इलाकों में यू-2 मिशन के विमानों को उड़ान भरने की इजाजत दी थी। ये दस्तावेज सूचना की आजादी अधिनियम के तहत प्राप्त किए गए हैं।
एनएसए ने सीआईए की 400 पन्नों की रिपोर्ट के आधार पर बताया है कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी तथा भारतीय राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन के बीच 3 जून 1963 को एक बैठक में ओडि़शा में द्वितीय विश्व युद्ध काल के खाली पड़े छारबातिया वायुसैनिक अड्डे के इस्तेमाल पर सहमति बनी थी। लेकिन, इस अड्डे में सुधार के लिए भारत को उम्मीदों के विपरीत काफी समय लगा और इसीलिए मिशन को थाइलैंड के ताखली से संचालित किया गया।
रिपोर्ट में 1954 से 1974 के बीच विमानों द्वारा संचालित जासूसी कार्यक्रमों का ब्यौरा दिया गया है जो बताता है कि दस नवंबर 1963 का यू-2 मिशन 11 घंटे 45 मिनट का था और यह यू 2 का सर्वाधिक लंबा मिशन था। इस मिशन के बाद पायलट इतना थक गया था कि परियोजना के प्रबंधकों ने भविष्य में ऐसी उड़ानों को अधिकतम दस घंटों के लिए सीमित कर दिया।
रिपोर्ट में बताया गया है कि वास्तव में यू 2 का सर्वाधिक लंबा मिशन 29 सितंबर 1963 को ताखली से संचालित किया गया मिशन था। एनएसए ने कहा है कि छारबातिया में मई 1964 में पहली तैनाती को नेहरू के निधन के कारण समाप्त कर दिया गया। एनएसए द्वारा सूचना की आजादी के अधिकार के तहत यू 2 मिशनों के बारे में सीआईए के गोपनीय सूची से हटाए गए इतिहास से ली गयी जानकारी के अनुसार, सीआईए के यू 2 विमानों द्वारा भरी गयी ये उड़ानें गोपनीय थीं। सीआईए ने इन्हीं उड़ानों के आधार पर भारत को उसके क्षेत्र में चीनी घुसपैठ के स्वरूप के बारे में बताया था।
रिपोर्ट कहती है, 'छारबातिया 1964 की शुरुआत में भी इस्तेमाल के लायक नहीं था, इसलिए 31 मार्च 1964 को डिटैचमैंट-जी ने ताखली से अन्य मिशन शुरू किया। छारबातिया से पहला मिशन 24 मई 1964 तक संचालित नहीं हो सका था। तीन दिन बाद प्रधानमंत्री नेहरू का निधन हो गया तथा आगे के मिशनों को स्थगित कर दिया गया।
राष्ट्रीय सुरक्षा अभिलेखागार (एनएसए) ने सीआईए से हासिल और हाल में गोपनीय सूची से हटाए गए दस्तावेजों के आधार पर तैयार एक रिपोर्ट में बताया है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 11 नवंबर 1962 को चीन के साथ लगे सीमावर्ती इलाकों में यू-2 मिशन के विमानों को उड़ान भरने की इजाजत दी थी। ये दस्तावेज सूचना की आजादी अधिनियम के तहत प्राप्त किए गए हैं।
एनएसए ने सीआईए की 400 पन्नों की रिपोर्ट के आधार पर बताया है कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी तथा भारतीय राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन के बीच 3 जून 1963 को एक बैठक में ओडि़शा में द्वितीय विश्व युद्ध काल के खाली पड़े छारबातिया वायुसैनिक अड्डे के इस्तेमाल पर सहमति बनी थी। लेकिन, इस अड्डे में सुधार के लिए भारत को उम्मीदों के विपरीत काफी समय लगा और इसीलिए मिशन को थाइलैंड के ताखली से संचालित किया गया।
रिपोर्ट में 1954 से 1974 के बीच विमानों द्वारा संचालित जासूसी कार्यक्रमों का ब्यौरा दिया गया है जो बताता है कि दस नवंबर 1963 का यू-2 मिशन 11 घंटे 45 मिनट का था और यह यू 2 का सर्वाधिक लंबा मिशन था। इस मिशन के बाद पायलट इतना थक गया था कि परियोजना के प्रबंधकों ने भविष्य में ऐसी उड़ानों को अधिकतम दस घंटों के लिए सीमित कर दिया।
रिपोर्ट में बताया गया है कि वास्तव में यू 2 का सर्वाधिक लंबा मिशन 29 सितंबर 1963 को ताखली से संचालित किया गया मिशन था। एनएसए ने कहा है कि छारबातिया में मई 1964 में पहली तैनाती को नेहरू के निधन के कारण समाप्त कर दिया गया। एनएसए द्वारा सूचना की आजादी के अधिकार के तहत यू 2 मिशनों के बारे में सीआईए के गोपनीय सूची से हटाए गए इतिहास से ली गयी जानकारी के अनुसार, सीआईए के यू 2 विमानों द्वारा भरी गयी ये उड़ानें गोपनीय थीं। सीआईए ने इन्हीं उड़ानों के आधार पर भारत को उसके क्षेत्र में चीनी घुसपैठ के स्वरूप के बारे में बताया था।
रिपोर्ट कहती है, 'छारबातिया 1964 की शुरुआत में भी इस्तेमाल के लायक नहीं था, इसलिए 31 मार्च 1964 को डिटैचमैंट-जी ने ताखली से अन्य मिशन शुरू किया। छारबातिया से पहला मिशन 24 मई 1964 तक संचालित नहीं हो सका था। तीन दिन बाद प्रधानमंत्री नेहरू का निधन हो गया तथा आगे के मिशनों को स्थगित कर दिया गया।
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