Sunday, September 2, 2018

स्वरोजगार

#भारत_में_रोजगार : समस्या और समाधान - भाग 1

भारत हजारों वर्षों से  स्वरोजगारियों का देश था। जब तक तुर्क मोघल नही आये थे तब तक वह विश्व की 35% जीडीपी का उत्पादक था।
लेकिन उनके आने लूट खसोट के कारण 1750 आते आते मात्र 24% जीडीपी का उत्पादक बचा। मोघल ने जो भी विनाश किया हो लेकिन कुछ दस्युओं को छोड़कर वे देश की धन दौलत को देश के बाहर नही ले गए।

लेकिन जब विश्वदस्यु ईसाइयो ने कब्जा किया तो भारत की कृषि_शिल्प_वाणिज्य का पूर्णतः विनाश किया जिसके कारण स्वरोजगार ध्वस्त हो गया।
अन्यथा उसके पूर्व भारत का नारा था - "उत्तम खेती मध्यम वान निशिद्धि चाकरी भीख निदान"।
1900 आते आते भारत मात्र 2% जीडीपी का उत्पादक बचा।
आजाद भारत मे नेहरू ने सोशलिस्ट मॉडल इकॉनमी को अपना कर स्वरोजगार का विनाश किया। और पढे लिखे लोगों के सामने रोजगार का एकमात्र रास्ता दिखाया - वह थी नौकरी।
नौकरी के गुण दोष में नही गिना रहा।
लेकिन स्वतंत्र  भारत मे कॉमर्स और स्वरोजगार को नाश करने के लिए कॉमर्स और स्वरोजगार के प्रति निरोधात्मक कानून बनाये गए, और जनता के उसके प्रति हीन भावना पैदा करने हेतु उनका माइंड मैनीपुलेशन किया गया।
उदाहरण स्वरूप यदि आपको कॉमर्स या स्वरोजगार करना है तो आपको जमीन की रजिस्ट्री, बैंक के लोन, गृह कर से लेकर बिजली तक के लिए ज्यादा धन खर्च करना होगा, सरकारी बाबूगिरी की बात छोड़ दो तो भी।

आखिर यह चाहते क्या हैं ? कि कॉमर्स और स्वरोजगार नष्ट हो। और जनता सरकार के ऊपर निर्भर होने को बाध्य हो।

वहीँ यदि आप बीच शहर में एक बीघे बंगले में 20 एयरकंडीशनर वाले बंगले में भी रहिये तो ऊपर वर्णित समस्त क्षेत्रो में आपको कम दामों पर समस्त सुविधाएं मिलेंगी।

तिस पर सबसे पॉपुलर नारा विकास का है जिसके विरोध में यदि आप बोलेंगे तो लोग आपका मुहं नोच लेंगे।
लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इससे लाभ किसको मिलता है - पॉलिटिशियन, ठेकेदार, बेरोक्रेटे को । और फर्राटेदार सङ्क बन गयी तो उस पर गाड़ियां किसकी दौड़ेंगी ?
कम से कम सड़क के किनारे जिनकी दुकान तोड़ी गयी होंगी, उनकी गाड़ियों की संख्या उन सड़को पर सबसे सबसे कम होंगी।

स्वरोजगार और कॉमर्स विरोधी सरकारी दृष्टिकोण और नीतियों के बाद भी भारत की करंट जीडीपी में किसका कितना योगदान है :
सरकार -18%
कृषि - 18%
कॉरपोरेट - 14%
स्वरोजगारी - 50 %

क्योंकि स्वरोजगार हजारो वर्षो से हमारी जीन्स में है।
इसका उपचार अगली पोस्ट में। आज भी नौकरी पर मात्र एक से दो प्रतिशत भारतीय परिवार जीवित है। और मात्र नौकरी को आधार बनाकर 70 साल से भारत को बांटा और लूटा जा रहा है।

ईस्ट इंडिया कंपनी के समुद्री लुटेरों ने जब भारत मे 1757 मे टैक्स इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी छीनी तो ऐसा कोई भी मौका हांथ से जाने नहीं दिया , जहां से भारत को लूटा जा सकता हो । वही काम पूरी के जगन्नाथ मंदिर मे हुआ । वहाँ पर शासन और प्रशासन के नाम पर , तीर्थयात्रियों से टैक्स वसूलने मे भी उन्होने कोताही नहीं की । तीर्थयात्रियों की चार श्रेणी बनाई गई । चौथी श्रेनी मे वे लोग रखे गए जो गरीब थे । जिनसे ब्रिटिश कलेक्टर टैक्स न वसूल पाने के कारण उनको मंदिर मे घुसने नहीं देता था । ये काम वहाँ के पांडे पुजारी नहीं करते थे, बल्कि कलेक्टर और उसके गुर्गे ये काम करते थे ।
( रेफ - Section 7 of Regulation IV of 1809 : Papers Relating to East India affairs )
इसी लिस्ट का उद्धरण देते हुये डॉ अंबेडकर ने 1932 मे ये हल्ला मचाया कि मंदिरों मे शूद्रों का प्रवेश वर्जित है । वो हल्ला ईसाई मिशनरियों द्वारा अंबेडकर भगवान को उद्धृत करके आज भी मचाया जा रहा है।
ज्ञातव्य हो कि 1850 से 1900 के बीच 5 करोड़ भारतीय अन्न के अभाव मे प्राण त्यागने को इस लिए मजबूर हुये क्योंकि उनका हजारों साल का मैनुफेक्चुरिंग का व्यवसाय नष्ट कर दिया गया था । बाकी बचे लोग किस स्थिति मे होंगे ये तो अंबेडकर भगवान ही बता सकते हैं। वो मंदिर जायंगे कि अपने और परिवार के लिए दो रोटी की व्यवस्था करेंगे ?
आज भी यदि कोई भी व्यक्ति यदि मंदिर जाता हैं और अस्व्च्छ होता है है तो मंदिर की देहरी डाँके बिना प्रभु को बाहर से प्रणाम करके चला आता है। और ये काम वो अपनी स्वेच्छा और पुरातन संस्कृति के कारण करता है , ण कि पुजारी के भय से।
जो लोग आज भी ये हल्ला मचाते हैं उनसे पूंछना चाहिए कि ऐसी कौन सी वेश भूषा पहन कर या सर मे सींग लगाकर आप मंदिर जाते हैं कि पुजारी दूर से पहचान लेता है कि आप शूद्र हैं ?
विवेकानंद ने कहा था - भूखे व्यक्ति को चाँद भी रोटी के टुकड़े की भांति दिखाई देता है।

एक अन्य बात जो अंबेडकर वादी दलित अंग्रेजों की पूजा करते हैं, उनसे पूंछना चाहूँगा कि अंग्रेजों ने अपनी मौज मस्ती के लिए जो क्लब बनाए थे , उसमे भारतीय राजा महराजा भी नहीं प्रवेश कर पाते थे।
बाहर लिखा होता था -- Indian and Dogs are not allowed । मुझे लगता हैं कि उनही क्लबो के किसी चोर दरवाजे से ###ों को अंदर एंट्री अवश्य दी जाती रही होगी ?
ज्ञानवर्धन करें ? ऐसा ही था न ?

IS BRITAIN RULING INDIA “ FOR INDIA’S GOOD ‘” ?
क्या ब्रिटिश भारत पर “भारत के भलाई के लिए” के लिए शासन कर रहा है ?
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"यहाँ ऐसा कुछ नहीं है जैसा की हमे अक्सर सुनने को मिलता है और जो लगातार पूरे विश्व मे घोषित किया जाता है कि ग्रेट ब्रिटेन भारत मे निस्वार्थ उद्देश्यों के कारण “ भारत कि भलाई के लिए “ यहा रह रहा है ; कि ये भारतीयों का  का ट्रस्टी है , जो “ईश्वरीय आदेश “ से भारत की “देखभाल” और “सुरक्षा” के लिए जिम्मेदार है , और इसलिए ये उसका कर्तव्य है कि उनको उनके इक्षा और विरोध के बावजूद गुलाम बना कर रखे और उन पर शासन करे, ; और वो विवादों के बावजूद भी “गोरों के कंधो पर रखा गया बोझ “ को उठा रहा है ; यद्यपि वो उनकी स्वतन्त्रता और स्वराज्य का पक्षधर है लेकिन ये तुच्छ और अज्ञानी लोग है जो अर्धसभ्य बच्चे के समान है, जिनको उच्च किस्म के ब्रिटिश मालिकान की तुलना मे , अपने भले बुरे का ज्ञान नहीं है , इसलिए उनके साथ बच्चों जैसा ही व्योहर करने की  बाध्यता है ; वास्तव मे , उसकी समवेदनाए इनके साथ जुड़ी हुयी है और वह निस्वार्थ भाव से उनको स्वराज्य के लिए शिक्षित कर रहा है , लेकिन ये काम बहुत सावधानी से और धीमे गति से करना पड रहा है क्योंकि अगर इनको तुरत फुरत मे स्वराज दे दिया जाय तो उसके परिणाम इनके लिए घातक  होंगे ।

लेकिन क्या ये एक दिखावा मात्र नहीं है ?

वर्ल्ड अफेयर्स के अमेरीकन विद्वान और इतिहासकर डॉ हेरबेर्ट एडम्स गिब्बंस भारत पर ब्रिटिश शासन के बारे मे अपना निर्णय सुनाते हुये लिखते हैं – “ कैप्टन ट्रोत्तर के “भारत का इतिहास “ या लोवाट फ्रेजर की “ India under Curzon and After “ को पढ़ने से , जब  भारत की बात आती है तो  आप को इन बुद्धिमान अंग्रेजों के Perverted नैतिकता का एहसास होता है । मैं कुछ बहुत ही अच्छे अंग्रेजों को जानता हूँ जिनहोने भारत मे सिविल या मिलिटरी मे अपनी सेवाएँ दी हैं। उनके मन मे कभी भी ये प्रश्न नहीं उठा कि वो भुखमरी से पीड़ित लोगों से उनकी इक्षा के विरुद्ध मोटा वेतन कैसे  ले रहे हैं , या सीमांत के आदिवासियों पर आक्रमण करके उनको गोलियों से भून रहे है , या किस तरह से वो भारतीयों की बेंत से पिटाई करने और उनकी हत्याओं की  निंदा क्यों नहीं कर रहे , जैसा कि वे स्वयम करते यदि उनके साथ कोई ऐसा ही बर्ताव करता तो । भारत के प्रति हो रहे अन्याया की अनदेखी करना ब्रिटिशर्स का  आनुवांशिक दोष है । ब्रिटिशर देशभक्त हैं।  उसको ये विश्वास है कि यदि वो मानवता की सेवा नहीं कर रहा  है तो अपने देश कि तो सेवा कर रहा है । लेकिन यदि वो ब्रिटिश के भारत मे शासन और उसकी उपस्थिति का आंकलन करेगा तो Whiteman ‘s Burden को सहने का क्या अर्थ है , उसको अवश्य समझ मे आएगा।

(1) एक ऐसे बाजार मे अपने समान कि बिक्री करना जहां कोई अन्य प्रतियोगी नहीं है ।
(2) इनवेस्टमेंट की सुविधा और concession के एकाधिकार
(3) पैरोल  पर जाने का अवसर

इस बात का विरोध यह बोलकर किया जा सकता है कि भारत के  व्यवसायिक शोसण के बदले उसको सुशासन प्रदान किया जा रहा है , तो उसका तात्कालिक उत्तर ये होगा कि ब्रिटेन कोई वहाँ लोकोपकारी काम नहीं कर रहा बल्कि इस शासन के बदले मे भारत से वो नकद मोटी रकम लेता है , जो ज़्यादातर अंग्रेजों को  एक अनुकूल और लाभकारी रोजगार देता है, जो उसके लिए दुनिया के किसी हिस्से मे भी प्राप्त नहीं हो सकती" ।

पेज – 68 – 70
J Sunderland

ये पुस्तक 1929 में प्रकाशित हुई थी 32 साल के रिसर्च के बाद।

एक अमेरिकन तथ्य जुटा रहा था।
पूरा भारत अंग्रेजो के खिलाफ आंदोलित था।

और बाबा साहेब साइमन और लोथियन के साथ ये निर्धारित कर रहे थे कि डिप्रेस्ड और अछूत कौन,  क्यो और कैसे है? अंत में निष्कर्ष निकाला कि 1935 के सरकारी परवाने में चिन्हित 429 जातियों में से मात्र एक जाति ही शास्त्रों के अनुसार अछूत है।
ॐ ।
JOURNEY FROM MADRAS  THROUGH THE COUNTRIES OF MYSORE, CANARA AND MALABAR

हैमिलटन बुचनन की ये पुस्तक 1807 में पब्लिश हुई थी।
1799 में टीपू को हराने के बाद 1800 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनको ईस्ट इंडिया के अधिकार क्षेत्र में दौरा करके उस क्षेत्र की कृषि, मैन्युफैक्चरिंग, जलवायु , जियोग्राफी, का विस्तार पूर्वक वर्णन करने का कॉन्ट्रैक्ट दिया था।

अभी प्रथम वॉल्यूम का  52 पेज तक पढा है।
वर्ण को वो pure Caste के नाम से संबोधित करते हैं।

पेज 29 पर वेलोर से पिलिगोंडा नामक स्थान की यात्रा का वर्णन है। जहां 1 मई 1800 को पिलिगोंडा मंदिर में एक शोभा यात्रा निकाली गई, बुचनन की आंख के सामने, जिसमे उज़को सीखने को मिला कि उस शोभायात्रा में ब्राम्हण वैश्य और शूद्र वर्ण (Pure Caste) के लोग सम्मिलित हुए। क्षत्रिय उस शोभा यात्रा में नही थे क्योंकि वे समूल नष्ट हो चुके थे। ( हेमिल्टन ने उनको messanger,  robbers, और warriors) में बांटा है)

पेज 29 पर लिखा कि इस्पात का निर्माण Malawanalu समुदाय द्वारा किया जाता है, जिनको मद्रास के निवासी उनके तिलंग भाषा में पेरियार कहते हैं।

पेज 35 पर क्षारीय मिट्टी से नमक बनाने की तकनीक का वर्णन है। ( आधुनिक नमक निर्माता इस तकनीक को आज तक नही खोंज पाये)।

पेज 39 और 40 में वलुरु नामक साप्ताहिक बाजार में गांव गांव में बनने वाले कपड़ो के निर्माण का वर्णन है। जिसमें दो किस्म के कपड़े बनाये जाते थे। मोटे कपड़े देश मे प्रयोग हेतु , और महीन कपड़े विदेश में एक्सपोर्ट करने हेतु, जो व्यापारियों से एडवांस मिलने पर निर्मित किय्ये जाते थे।

पेज 52 पर लिखता है कि हुक्का सिर्फ मुसलमान पीते थे। बीड़ी लोग पीते हैं, लेकिन यदि किसी ब्राम्हण ने बीड़ी पिया तो उसको जात बाहर कर दिया जाएगा।
और धनी शूद्रों में भी यह अच्छा नही माना जाता है।

अभी तक अछूतपन का वर्णन एक बार भी नही आया है।

छोटे तबके, और बड़े तबके की बात अवश्य लिखी है।

लेकिन वो तो अनादिकाल से हर देश और समुदाय में रहे हैं और रहेंगे।

दलित चिन्तक #Karls #बॉयज एंड #गर्ल्स इस रहस्य को समझाएं।

इकॉनोमिक हिस्ट्री तो सबको मुंहजबानी याद ही है।

भारत के बुद्धुजीवियों जिन कारणों से संविधान में कास्ट को समाहित किया गया वह तुम जानते ही होंगे।

संविधान के निर्माता ब्रिटिश एडुकेटेड इनोसेंट इंडियन बरिस्टर्स (BEIIBS) यदि इन तथ्यों को पढ़ लेते तो........
✍🏻
©डॉ त्रिभुवन सिंह

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