Monday, November 11, 2013

देखिये नौटंकी कुमार को



बड़े नाजुक कदम है आपके ... गंगा नदी के पानी से मैले हो जायेंगे ... इसलिए इन्हें आरओ सिस्टम द्वारा फिल्टर्ड और क्लोरीनेटेड पानी में ही रखियेगा ||

ये देखिये नौटंकी कुमार को ... कल तक बड़ी बड़ी बाते कर रहे है , हम जमीन से जुड़े है आदि आदि ,और जनाब छठ भी मनाते है तो आलिशान स्विमिंग पुल में ..और वो भी सीसे की तरह चमचमाते पानी में ..

क्या कहा ?? दोगला ?? नही ,,इनके लिए ये भी इज्जत होगी
 

भारत बहुत ही गरीब देश है

1. हमारे देश के बारे में यह प्रचारित किया गया है कि भारत बहुत ही गरीब देश है।
2. दुनियां भर के विदेशी आक्रमण क्या हमारी गुदडी चुराने के लिए हुए थे।
3. चंगेज खान ४ करोड लोगों की हत्या करके क्या अपने घोडों पर ईंट और पत्थर लाद कर ले गया था?
4. सोमनाथ मंदिर को बार बार सोने से कौन भर देता था यदि हमारे पुरखे गरीब थे?
5. श्रम करने वाला कभी गरीब हो ही नहीं सकता है। हमारे किसान औसत १४ घंटे काम करते हैं। वे गरीब क्यों हैं?
6. आज हमारे देश से विदेशी कंपनियां आधिकारिक रूप से २,३२,००० करोड का शुद्घ मुनाफा अपने देश लेकर जा रही हैं।
7. बाकी सभी तरह का फर्जी हिसाब, उनका आयातित कच्चे माल का भुगतान, चोरी आदि जोडा जाय तो यह रकम २५,००,००० करोड सलाना बैठती है।
8. क्या कोई गरीब देश इतना टर्न ओवर पैदा करवा सकता है?
9. हमारे देश में दवाओं का सालाना कारोबार १०,००,००० करोड का है, क्या यह गरीब देश की निशानी है?
10. हमारे देश में सालाना ६,००,००० करोड का जहर का व्यापार विदेशी कंपनियां कर रही है। क्या यह गरीबी की निशानी है?
11. हमारे देश में १०,००० लाख करोड का खनिज पाया जाता है और इसका दोहन भी विदेशी कंपनियां बहुत ही सस्ते भाव पर कर रही हैं।
12. तो क्या हम गरीब हैं?
13. जब हम रॉकेट और सैटेलाइट बना कर चांद पर पहुंच सकते हैं तो नोट छापने का कागज़ और स्याही विदेशी कंपनियों से क्यों लिया जाता है जो हमारी पीठ में छुरा घोंपकर उसी डिजाइन में थोडा सा न दिखने वाला परिवर्तन करके खरबों रुपये का नकली नोट छापकर विदेशी खुफिया तंत्रों को बेचकर हमें कंगाल बना रही हैं?
14. यदि हम गरीब होते तो क्या अंग्रेज यहां खाक छानने आये थे।
15. राबर्ट क्लाइव ९०० पानी के जहाज भरकर सोना चांदी हीरे सिर्फ कोलकाता से कैसे ले गया था?

मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक सबने हमें लूटा और हमें समाप्त करने की कोशिश भी करी गयी, हमारे स्वाभिमान और आत्मविश्वास पर कुठाराघात भी किया गया, हमें यह सिखाया एवं विश्वास दिलाया गया कि हम कुछ नहीं कर सकते, परन्तु इस देश के लोगों का पुरुषार्थ ऐसा कि इतना लुटने के बाद,इतने षड्यंत्रों के बाद भी हम जिन्दा हैं, हाँ यह अवश्य है कि आज हम संपन्न राष्ट्र नहीं हैं, परन्तु याद रखिये जितना शोषण इस राष्ट्र का हुआ है अगर उसका 10% भी किसी और देश का हुआ होता तो वह देश शताब्दियों पहले विश्व के मानचित्र से गायब हो जाता, हम आज भी अस्तित्व में हैं यह अपने आप में गर्व का विषय है।
जिस दिन इस राष्ट्र के लोगों का स्वाभिमान पुनः जागृत हो गया विश्वास मानिये उस दिन इस राष्ट्र को अपना पुराना गौरव प्राप्त करने में तनिक भी विलम्ब न होगा, अतः गुलामी की मानसिकता से बाहर आयें, अपने राष्ट्र पर, अपने पूर्वजों पर गर्व करें, अपने पुरुषार्थ पर विश्वास करें और अपना और अपने राष्ट्र का पुनर्निर्माण करें।

"SILVER FOIL IS NOT VEGETARIAN "- accepted by companies.

Thursday, November 7, 2013

हल्दी वाला दूध

हल्दी वाला दूध ------
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रात को सोते समय देशी गाय के गर्म दूध में एक चम्मच देशी गाय का घी और चुटकी भर हल्दी डालें . चम्मच से खूब मिलाकर कर खड़े खड़े पियें.
- इससे त्रिदोष शांत होते है.
- संधिवात यानी अर्थ्राईटिस में बहुत लाभकारी है.
- किसी भी प्रकार के ज्वर की स्थिति में , सर्दी खांसी में लाभकारी है.
- हल्दी एंटी माइक्रोबियल है इसलिए इसे गर्म दूध के साथ लेने से दमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों में कफ और साइनस जैसी समस्याओं में आराम होता है. यह बैक्टीरियल और वायरल संक्रमणों से लड़ने में मदद करती है.
- वजन घटाने में फायदेमंद
गर्म दूध के साथ हल्दी के सेवन से शरीर में जमा चर्बी घटती है. इसमें मौजूद कैल्शियम और मिनिरल्स सेहतमंद तरीके से वजन घटाने में सहायक हैं।
- अच्छी नींद के लिए
हल्दी में अमीनो एसिड है इसलिए दूध के साथ इसके सेवन के बाद नींद गहरी आती है.अनिद्रा की दिक्कत हो तो सोने से आधे घंटे पहले गर्म दूध के साथ हल्दी का सेवन करें.
- दर्द से आराम
हल्दी वाले दूध के सेवन से गठिया से लेकर कान दर्द जैसी कई समस्याओं में आराम मिलता है. इससे शरीर का रक्त संचार बढ़ जाता है जिससे दर्द में तेजी से आराम होता है.
- खून और लिवर की सफाई
आयुर्वेद में हल्दी वाले दूध का इस्तेमाल शोधन क्रिया में किया जाता है। यह खून से टॉक्सिन्स दूर करता है और लिवर को साफ करता है. पेट से जुड़ी समस्याओं में आराम के लिए इसका सेवन फायदेमंद है.
- पीरियड्स में आराम
हल्दी वाले दूध के सेवन से पीरियड्स में पड़ने वाले क्रैंप्स से बचाव होता है और यह मांसपेशियों के दर्द से छुटकारा दिलाता है.
- मजबूत हड्डियां
दूध में कैल्शियम अच्छी मात्रा में होता है और हल्दी में एंटीऑक्सीडेट्स भरपूर होते हैं इसलिए इनका सेवन हड्डियों को मजबूत करता है और शरीर की प्रतिरोधी क्षमता घटाता है.
- इसे पिने से गैसेस निकलती है और अफारा , फुले पेट में तुरंत लाभ मिलता है.
हल्दी वाला दूध ------
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रात को सोते समय देशी गाय के गर्म दूध में एक चम्मच देशी गाय का घी और चुटकी भर हल्दी डालें . चम्मच से खूब मिलाकर कर खड़े खड़े पियें.
- इससे त्रिदोष शांत होते है.
- संधिवात यानी अर्थ्राईटिस में बहुत लाभकारी है.
- किसी भी प्रकार के ज्वर की स्थिति में , सर्दी खांसी में लाभकारी है.
- हल्दी एंटी माइक्रोबियल है इसलिए इसे गर्म दूध के साथ लेने से दमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों में कफ और साइनस जैसी समस्याओं में आराम होता है. यह बैक्टीरियल और वायरल संक्रमणों से लड़ने में मदद करती है.
- वजन घटाने में फायदेमंद
गर्म दूध के साथ हल्दी के सेवन से शरीर में जमा चर्बी घटती है. इसमें मौजूद कैल्शियम और मिनिरल्स सेहतमंद तरीके से वजन घटाने में सहायक हैं।
- अच्छी नींद के लिए
हल्दी में अमीनो एसिड है इसलिए दूध के साथ इसके सेवन के बाद नींद गहरी आती है.अनिद्रा की दिक्कत हो तो सोने से आधे घंटे पहले गर्म दूध के साथ हल्दी का सेवन करें.
- दर्द से आराम
हल्दी वाले दूध के सेवन से गठिया से लेकर कान दर्द जैसी कई समस्याओं में आराम मिलता है. इससे शरीर का रक्त संचार बढ़ जाता है जिससे दर्द में तेजी से आराम होता है.
- खून और लिवर की सफाई
आयुर्वेद में हल्दी वाले दूध का इस्तेमाल शोधन क्रिया में किया जाता है। यह खून से टॉक्सिन्स दूर करता है और लिवर को साफ करता है. पेट से जुड़ी समस्याओं में आराम के लिए इसका सेवन फायदेमंद है.
- पीरियड्स में आराम
हल्दी वाले दूध के सेवन से पीरियड्स में पड़ने वाले क्रैंप्स से बचाव होता है और यह मांसपेशियों के दर्द से छुटकारा दिलाता है.
- मजबूत हड्डियां
दूध में कैल्शियम अच्छी मात्रा में होता है और हल्दी में एंटीऑक्सीडेट्स भरपूर होते हैं इसलिए इनका सेवन हड्डियों को मजबूत करता है और शरीर की प्रतिरोधी क्षमता घटाता है.
- इसे पिने से गैसेस निकलती है और अफारा , फुले पेट में तुरंत लाभ मिलता है.

कैसे रहें भूतों से सुरक्षित

कैसे रहें भूतों से सुरक्षित

हिन्दू धर्म में भूतों से बचने के अनेकों उपाय बताए गए हैं। पहला धार्मिक उपाय यह कि गले में ॐ या रुद्राक्ष का लाकेट पहने, सदा हनुमानजी का स्मरण करें। चतुर्थी, तेरस, चौदस और अमावस्य को पवि‍त्रता का पालन करें। शराब न पीएं और न ही मांस का सेवन करें। सिर पर चंदन का तिलक लगाएं। हाथ में मौली (नाड़ा) अवश्य बांधकर रखें।

घर में रात्रि को भोजन पश्चात सोने से पूर्व चांदी की कटोरी में देवस्थान पर कपूर और लौंग जला दें। इससे आकस्मिक, दैहिक, दैविक एवं भौतिक संकटों से मुक्त मिलती है।

प्रेत बाधा दूर करने के लिए पुष्य नक्षत्र में धतूरे का पौधा जड़ सहित उखाड़कर उसे ऐसा धरती में दबाएं कि जड़ वाला भाग ऊपर रहे और पूरा पौधा धरती में समा जाए। इस उपाय से घर में प्रेतबाधा नहीं रहती।

प्रेत बाधा निवारक हनुमत मंत्र- ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ऊँ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत पिशाच-शाकिनी-डाकिनी-यक्षणी-पूतना-मारी-महामारी, यक्ष राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकम्‌ क्षणेन हन हन भंजय भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामारेश्वर रुद्रावतार हुं फट् स्वाहा। इस हनुमान मंत्र का पांच बार जाप करने से भूत कभी भी निकट नहीं आ सकते।

हनुमान जी के बाद मां कालका के स्मरण मात्र से किसी भी प्रकार की भूतबाधा है तो तत्काल ही हट जाती है। मां काली के कालिका पुराण में कई मंत्रों का उल्लेख मिलता है।

सरसों के तेल का या शुद्ध घी का दिया जलाकर काजल बना लें। ये काजल लगाने से भूत, प्रेत, पिशाच आदि से रक्षा होती है और बुरी नजर से भी रक्षा होती है।

चरक संहिता में प्रेत बाधा से पीड़ित रोगी के निदान के उपाय विस्तार से मिलते हैं। ज्योतिष साहित्य के मूल ग्रंथों- प्रश्नमार्ग, वृहत्पराषर, होरा सार, फलदीपिका, मानसागरी आदि में ज्योतिषीय योग हैं जो प्रेत पीड़ा, पितृदोष आदि बाधाओं से मुक्ति का उपाय बताते हैं। अथर्ववेद में दुष्ट आत्माओं को भगाने से संबंधित अनेक उपायों का वर्णन मिलता है।

सावधानी : नदी, पूल या सड़क पार करते समय भगवान का स्मरण जरूर करें। एकांत में शयन या यात्रा करते समय पवित्रता का ध्यान रखें। पेशाब करने के बाद धेला अवश्य लें और जगह देखकर ही पेशाब करें। रात्रि में सोने से पूर्व भूत-प्रेत पर चर्चा न करें। किसी भी प्राकार के टोने-टोटकों से बच कर रहें।

ऐसे स्थान पर न जाएं जहां पर तांत्रिक अनुष्ठान होता हो, जहां पर किसी पशु की बलि दी जाती हो या जहां भी लोबान आदि धुंवे से भूत भगाने का दावा किया जाता हो। भूत भागाने वाले सभी स्थानों से बच कर रहें, क्योंकि यह धर्म और पवित्रता के विरुद्ध है।

जो लोग भूत, प्रेत या पितरों की उपासना करते हैं वह राक्षसी कर्म के होते हैं ऐसे लोगों का संपूर्ण जीवन ही भूतों के अधिन रहता है। भूत-प्रेत से बचने के लिए ऐसे कोई से भी टोने-टोटके न करें जो धर्म विरुद्ध हो। हो सकता है आपको इससे तात्कालिक लाभ मिल जाए, लेकिन अंतत: जीवन भर आपको परेशान ही रहना पड़ेगा।

अन्य उपाय :
यदि बच्चा बाहर से आए और थका, घबराया या परेशान सा लगे तो यह नजर लगने की पहचान है। ऐसे में उसके सर से 7 लाल मिर्च और एक चम्मच राई के दाने 7 बार घूमाकर उतारा कर लें और फिर आग में जला दें। यदि डरावने सपने आते हों, तो हनुमान चालीसा और गजेंद्र मोक्ष का पाठ करें और हनुमान मंदिर में हनुमानजी का श्रृंगार करें व चोला चढ़ाएं।

अशोक वृक्ष के सात पत्ते मंदिर में रख कर पूजा करें। उनके सूखने पर नए पत्ते रखें और पुराने पत्ते पीपल के पेड़ के नीचे रख दें। यह क्रिया नियमित रूप से करें, घर भूत-प्रेत बाधा, नजर दोष आदि से मुक्त रहेगा।

भूतादि से पीड़ित व्यक्ति की पहचान

भूतादि से पीड़ित व्यक्ति की पहचान उसके स्वभाव एवं क्रिया में आए बदलाव से की जाती है। अगल-अलग स्वाभाव परिवर्तन अनुसार जाना जाता है कि व्यक्ति कौन से भूत से पीड़ित है।
भूत पीड़ा : यदि किसी व्यक्ति को भूत लग गया है तो वह पागल की तरह बात करने लगता है। मूढ़ होने पर भी वह किसी बुद्धिमान पुरुष जैसा व्यवहार भी करता है। गुस्सा आने पर वह कई व्यक्तियों को एक साथ पछाड़ सकता है। उसकी आंखें लाल हो जाती हैं और देह में सदा कंपन बना रहता है।
पिशाच पीड़ा : पिशाच प्रभावित व्यक्ति सदा खराब कर्म करना है जैसे नग्न हो जाना, नाली का पानी पीना, दूषित भोजन करना, कटु वचन कहना आदि। वह सदा गंदा रहता है और उसकी देह से बदबू आती है। वह एकांत चाहता है। इससे वह कमजोर होता जाता है।
प्रेत पीड़ा : प्रेत से पीड़ित व्यक्ति चिल्लाता और इधर-उधर भागता रहता है। वह किसी का कहना नहीं सुनता। वह हर समय बुरा बोलता रहता है। वह खाता-पीता नही हैं और जोर-जोर से श्वास लेता रहता है।
शाकिनी पीड़ा : शाकिनी से ज्यादातर महिलाएं ही पीड़ित रहती हैं। ऐसी महिला को पूरे बदन में दर्द बना रहता है और उसकी आंखों में भी दर्द रहता है। वह अक्सर बेहोश भी हो जाती है। कांपते रहना, रोना और चिल्लाना उसकी आदत बन जाती है।
चुडैल पीड़ा : चुडैल भी ज्यादातर किसी माहिला को ही लगती है। ऐसी महिला यदि शाकाहारी भी है तो मांस खाने लग जाएगी। वह कम बोलती, लेकिन मुस्कुराती रहती है। ऐसी महिला कब क्या कर देगी कोई भरोसा नहीं।
यक्ष पीड़ा : यक्ष से पीड़ित व्यक्ति लाल रंग में रुचि लेने लगता है। उसकी आवाज धीमी और चाल तेज हो जाती है। वह ज्यादातर आंखों से इशारे कहता रहता है। इसकी आंखें तांबे जैसी और गोल दिखने लगती हैं।
ब्रह्मराक्षस पीड़ा : जब किसी व्यक्ति को ब्रह्मराक्षस लग जाता है तो ऐसा व्यक्ति बहुत ही शक्तिशाली बन जाता है। वह हमेशा खामोश रहकर अनुशासन में जीवन यापन करता है। इसे ही जिन्न कहते हैं। यह बहुत सारा खाना खाते हैं और घंटों तक एक जैसे ही अवस्था में बैठे या खड़े रहते हैं। जिन्न से ग्रस्त व्यक्ति का जीवन सामान्य होता है ये घर के किसी सदस्य को परेशान भी नहीं करते हैं बस अपनी ही मस्ती में मस्त रहते हैं। जिन्नों को किसी के शरीर से निकालना अत्यंत ही कठीन होता है।
इस तरह से और भी कई तरह के भूत होते हैं जिनके अलग अलग लक्षण और लक्ष्य होते हैं।

मांसाहार न करें.

मांसाहार न करें.
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वैज्ञानिक कारण-
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शरीर हारमोनो से संचालित है
हारमोन वह केमिकल हैं जो शरीर से ही स्रावित होते हैं और इसी में अवशोषित होकर इसे प्रभावित कर देते हैं, यह प्रभाव चिरस्थाई होता है. इस प्रभाव को किसी प्रकार मिटाया नही जा सकता. जब हमारी ह्त्या होती है तो हम विषाक्त हारमोन छोड़ते हैं क्यूँ की हमारा मन भय, यंत्रणा और विषाद से भरा होता है. यही सत्य है पशुओ के साथ. एक पशु जब मरता है तो उसके भीतर विषाक्त हारमोन निकल कर उसके मांस में जज्ब हो जाते हैं. पशु समूह में रहते हैं और नित्य अपने साथी को ह्त्या होते महसूस करते हैं. यह हारमोन अनेक दफा रिस-रिस कर उनके मांस में मिल चुका होता है. यह हारमोन विकार, भय, विषाद और भयानक यंत्रणा का परिणाम है और भोजन द्वारा मांसाहारी के शरीर में पहुँच कर वही भाव उत्पन्न करेगा. मांसाहारी स्वयं को हिंसक होने से नही रोक सकता, वह भय ग्रस्त होता है, अवसाद उसकी प्रवृति होती है. क्रोध का वह दास हो जाता है और अनेक व्याधियां उसे घेर लेती हैं . आप मांस खाने के बाद कभी उत्फुल और हल्का अनुभव नही कर सकते .. मांस खाने के बाद एक नकारात्मक भाव हमेशा घेरता है यह उन जहरीले हारमोनो के कारण है.
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शारीरिक कारण-
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मनुष्य का पेट शाकाहार के लिए उपयुक्त है. मानव आंत लम्बी है और यह प्राथमिक आहार के लिए बनाई गयी है. मांस द्वितीयक आहार है .. द्वितीयक आहार का अर्थ है यह पशुओ द्वारा पहले ही पचाया जा चुका है. मांस पुनः हमारे अमाशय में जाता है और यह प्राथमिक आहार की भाँती यंत्र में यात्रा करता है .. अंत कन्फ्यूज हो जाती है. मांस जल्दी पच जाता है लेकिन आँतों में अनेक मेटाबोलिक विकार पैदा करता है. जैसे गैस, एसिडिटी, अल्सर, अपच, कब्ज, आदि. यह शरीर के कन्फ्यूजन के कारण होता है. मांसाहारी पशुवों का अमाशय हमेशा छोटा होता है. जैसे शेर, चीता, मगर आदि का पेट कभी बड़ा नही होता. मानव का पेट शाकाहार के लिए बना है.
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आध्यात्मिक कारण-
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मानव पंचेन्द्रिय है. अर्थात उसके पास पांच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं. जैन धर्म में इसका गहनतम शोध हुआ है . इसी प्रकार पशु चात्रुरेंद्रिय हैं, पौधे द्वेन्द्रिय हैं और पत्थर जड़ आदि एकेंद्रिय हैं. लोग कहते हैं की आखिर पौधों में भी तो जान है तो क्या वह ह्त्या नही हुई?
हमे कम हिंसा और अधिक हिंसा में चुनना है. हिंसा का प्रश्न बाद में है हमारी संवेदना का प्रश्न पहले है. हम हिंसा न भी करे तो भी मृत्यु होती ही है लेकिन हिंसा करके हम कर्मो का जो जाल बनाते हैं वह हमे भुगतान करना पड़ता है. साधारण जीवन में हम कम भुगतान करके अच्छी चीज़ें खरीदते हैं. जैसे टी वी हम वही लेते हैं जो कम मूल्य में अधिक गुणवत्ता पूर्ण हो.. इसी भाँती यदि हम चतुरेंद्रिय की बजाय द्विएन्द्रिय का आहार करेंगे तो यह कम भूगतान में काम चल जाएगा. इससे हिंसा नही होगी. कारण यह है की हमने अपनी संवेदना का विकास किया. इसी लिए धर्मो ने शाकाहार पर इतना जोर दिया है. उपरोक्त विषाक्तता से भी बच जायेंगे और एक अन्य महत्वपूर्ण अंतर यह है की अन्न या वृक्ष का बीज उनके मृत्यु के बाद भी काम आता है. धान का पौधा जो बीज देगा वह धान के काटने के बाद भी काम आएगा. पशु के सन्दर्भ में ऐसा नही है. पशु एक जटिल संरचना है.जो जीवन की मुक्ति में उत्सुक है वह जटिलता से सहजता की तरफ अभियान करता है. कर्म्बंधों का जाल नही निर्मित करता है.
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कॉस्मिक कारण
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आत्मलोक में हम एक प्रेम पूर्ण जगत में रहते हैं. शाकाहार हमें मृत्यु के बाद की आत्मग्लानि से बचाता है. आत्मलोक का जिन्हें अनुभव है वह यह जानते हैं की शिक्षण के क्रम में हमें उन जीवों से सामना करना होता है जिसको हमने कष्ट दिया है. ( वैज्ञानिक विवरण के लिए पढ़े- डेस्टिनी ऑफ़ सोल- माईकल न्यूटन) यह कष्ट हमारे आगामी जन्म की दिशा और दशा का निर्धारण करता है. यदि हमने परोपकार का जीवन जिया है तो मानसिक /आत्मिक लोक में हम सुख का उपभोग करते हैं. यह स्वर्ग कहा गया है अन्यथा जघन्य विषाद का- यानी नर्क का. क्यूँ की अस्तित्व में यह स्वयं सिद्ध नियम है की चीज़े पुनः पुनः हमपर ही लौट आतीं हैं. क्यूँ की अंततः हमारे अतिरिक्त कोई और नही है. यह अद्वैत का अनुभव है.
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मानसिक कारण-
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हम केवल स्थूल शरीर नही हैं. हमारे भीतर अन्य ७ शरीर है. जिसे मैंने अपने आलेख सम्भोग और समाधि: पूर्ण विज्ञान में विस्तार से बताया है,( यह आलेख नीचे के पोस्ट में उपलब्ध है.) हमारे पास एक मनस शरीर है. जो भावों और विचारों से ही संचालित होता है. हमारा स्थूल शरीर सिर्फ आहार से बनता है. मांसाहार इसे विकृत करता है और इसकी पारदर्शिता को नष्ट कर देता है. विकृत स्थूल शरीर को अन्य गहरे शरीरों का अनुभव नही होता . जैसे हमारा दुसरा शरीर है मनस शरीर जो बनता है हमारे मानसिक आहार से. यह विकसित नहीं हो पायेगा यदि प्रथम शरीर स्वस्थ नही हो तो. अतः मांसाहार हमारी प्रतिभा को कुंद करता है. मांसाहारी बुद्धिमान नही हो सकते. जिन परिवारों में पीढ़ी दर पीढ़ी मांस खाया गया हो वह पशुवत हो जाते हैं. क्यूँ की स्थूल आहार पशु का है तो प्रभाव भी पशु का ही होना तय है. शरीरो का यह असंतुलन पागलपन में और अन्य मानसिक व्याधियो में बदल जाता है. ब्रिटेन में गाय का मांस खाने वाले पागलपन की एक नई किस्म से पीड़ित हैं. मांसाहार पागलपन और त्वचा रोग का सबसे बड़ा कारण है.
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धार्मिक कारण-
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धर्म है अपने आत्मा की खोज. यह साधनाओ का सार है. सत -चित आनंद का अभियान है. धर्म साधना में आहार यदि निर्भार करने वाला हो. सात्विक हो, अनुत्तेजना देने वाला हो तो यात्रा को पंख लग जाते हैं और मंजिल कम से कम प्रयासों में उपलब्ध हो जाती है. उसी प्रकार जिस प्रकार नाव सागर में चल रही है और हवा भी अनुकूल है. सम्यक शाकाहार अनुकूलन करता है. एक मांसाहारी व्यक्ति ध्यान में १ घंटे नही बैठ सकता. वह गहरे ध्यान में नही जा सकता. जिसने मुर्दा खा रखा है वह समाधि की कल्पना नही कर सकता. जिसने इतनी असंवेदना दिखाई है की किसी की जान हथ कर आहार कर लिया है उसके ह्रदय में परमात्मा को अतिकोमल पुष्प कैसे खिलेगा? इसीलिए धर्मों ने साधना में शाकाहार का इतना महत्व दिया है.
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नैतिक कारण-
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मुझे याद है की मैं जब हॉस्टल में थी और मेस में खाना खाती थी तो मुझसे मेरे मित्र एक प्रश्न अक्सर करते थे. क्षत्रिय कुल/गोत्र/जाती की होकर भी तुम मांस नही खाती?
मैं उनसे पूछती - ' एक बात का उत्तर दो ! क्षत्रित्व नष्ट करने में है की सृजन करने में? क्षत्रित्व संवेदना में है की ह्त्या में? क्षत्रित्व जीवन देने में है? रक्षा करने में है की दुर्बल को मारने में? और आगे मुझे कहने की आवश्यकता नही की उनका क्या उत्तर होगा? मेरे २ साल के अध्ययन काल में उस मेस में मांसाहार बंद हो गया. कुछ मुस्लिम और आदिवासी भी थे उन्होंने ने भी मांसहार त्याग दिया. मानवता है किसी का कुछ भला कर सके तो कर दिया.. न कर सके तो कम से कम बुरा न किया. यह मानव होने का अन्तर्निहित अर्थ है. मांसाहार मानवता के विरुद्ध आचरण है.
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अतिरंजनाये-
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* इस्लाम में मांसाहार की अनुमति है.
यह गलत है. एक जगह बकरे की क़ुरबानी का वर्णन है जो इस सन्दर्भ में है की अपने प्रिय वस्तु की क़ुरबानी दो. जीवो पर दया करने का स्पष्ट आदेश है कुरआन में.
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* बुद्ध में मरे हुए पशु की मांस खाने की अनुमति दी.
यह सत्य है पर यह बुद्ध की मनुष्य के अंधी खाई में कूदने को टालने के लिए छोटे गढ्ढे में कूदने की अनुमति देने के समान है. ताकि कम से कम नुक्सान हो. मनुष्य मूर्छित है. प्रतिबंधित चीज़ उसके मन में अवरोध बन जाती है. मांस खा कर ध्यान नही हो सकता तो जो मांस पर ही अटक गया है उसे खिला दो. उब कर वह ध्यान करने को इसे त्याग देगा. बुद्ध की यह अति जड़ शिष्यों के लिए करुणा थी. और कोई नियम मूर्छित को नही रोक सकते जब तह वह खुद ही न चेते.
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*जीसस , रामकृष्ण, विवेकानंद मांसाहारी थे.
इसके स्पष्ट प्रमाण नही उपलब्ध. रामकृष्ण तो पार थे. उनके लिए अब क्या नियम .क्या त्याग? जीसस आदिम समाज में थे अतः संभव हो सकता है पर कहीं उल्लिखित नही. विवेक नन्द बंगाली संस्कृति में थे .. वह अंततः उपलब्ध हुए. मांस एक अवरोध बना रहा. और उनके मांस के नही वरन मछली खाने की चर्चा है.
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* मांसाहारी बलिष्ट होते हैं.
सांड सदा कमल के फुल से मजबूत होगा लेकिन कभी मूल्यवान नही. बल सूक्ष्म हो तो ज्यादा प्रभावकारी है. कोमलता, सौन्दर्य का भी बल होता है.
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* मांसाहार नही करेंगे तो पशुवो की संख्या अनियंत्रित तौर पर बढ़ जायेगी.
यह मनुष्यों पर भी लागू होता है तो ऐसे विचार धारा के लोग मानव खाना भी प्रारंभ करे.
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मांसाहार के भयानक तथ्य:
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वैश्विक ऊष्मण (Global Warming) को कम करने के लिए 1997 में जापान के क्योटो शहर में दुनिया के 156 देशों के द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय संधि हुई जिसे क्योटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol) कहते हैं। इसका उद्देश्य वैश्विक ऊष्मण के कारणों का पता लगाना था। इसमें वैज्ञानिकों का एक बड़ा दल बना जिसके अध्यक्ष थे - डॉ॰ आर॰ के॰ पचौरी। इस दल ने 4 वर्षों के अध्ययन के बाद बताया की सारी दुनिया में गर्मी बढ्ने का मुख्य कारण है लोगों द्वारा मांसाहारी भोजन का उपयोग एवं उपभोग।

* दुनिया भर में मांस उत्पादन: दुनिया में लगभग 200 देश हैं और सभी देशों को मिलाकर मांस का कुल उत्पादन 26 करोड़ 50 लाख मीट्रिक टन (एक मीट्रिक टन में लगभग 1000 किग्रा॰ होते हैं)। मांस कंपनियों का कहना है की 2050 तक इस उत्पादन को 46 करोड़ मीट्रिक टन कर देंगे, माने आज के उत्पादन का लगभग दो गुना। इसके मांस कंपनियां पूरी दुनिया को मांसाहारी बनाने के काम में लग गयी हैं। इनके विज्ञापन रोज़ टीवी पर आ रहे हैं। ये मांस कंपनियों का ही विज्ञापन है "संडे हो या मंडे, रोज़ खाओ अंडे" ? और हमारे देश के कई अभिनेता, अभिनेत्री, खिलाड़ी और सम्माननीय लोग पैसे के लालच में अंडों का विज्ञापन करते हैं, जो खुद निजी ज़िंदगी में शाकाहारी हैं।
कुल मांस का उत्पादन 26 करोड़ 50 लाख मीट्रिक टन है जिसमें से मुर्गे मुर्गियों के मांस का उत्पादन है 1 करोड़ मीट्रिक टन। सूअर के मांस का उत्पादन है 10 करोड़ मीट्रिक टन। गाय के मांस का उत्पादन है 6 करोड़ मीट्रिक टन। इतने मांस के उत्पादन के लिए हर साल पूरी दुनिया में 46 अरब (4600 करोड़) जानवरों का कत्ल होता है।

* भारत की स्थिति: भारत में हर साल 58 लाख मीट्रिक टन मांस का उत्पादन होता है अर्थात् पूरी दुनिया के मांस उत्पादन का लगभग 2%। भारत में 121 करोड़ नागरिक हैं जिनमें 70% शाकाहारी और 30% मांसाहारी हैं। भारत सरकार के 2009 के आंकड़ों के अनुसार भारत में मांस के उत्पादन में गाय का मांस 14 लाख टन पैदा होता है, भैंस का मांस करीब 14 लाख टन, मटन करीब 2.5 लाख टन, सूअर का मांस करीब 6 लाख 30 हज़ार टन, मुर्गे- मुर्गियों का मांस 16 लाख टन और बाकी छोटे जानवरों का शामिल है। इतने मांस के उत्पादन के लिए भारत में करीब 10 करोड़ 50 लाख जानवरों का कत्ल किया गया। इनमें करीब 4.5 करोड़ गाय, भैंस, बैल हैं और बाकी छोटे जानवर जैसे- बकरे- बकरी, मुर्गे- मुर्गी आदि।
भारत में 3600 सरकार के रजिस्टर्ड (Registered) कत्लखाने हैं और करीब 36000 अनरजिस्टर्ड (Unregistered) कत्लखाने हैं।

* भोजन की कमी और मांसाहार: 1 एकड़ खेत के एक साल के उत्पादन से 22 लोगों का पेट भरा जा सकता है लेकिन यदि उसी एक एकड़ खेत के एक साल के उत्पादन को अगर जानवरों को खिलाया जाए और फिर उनका मांस खाया जाए तो केवल 2 लोगों का पेट साल भर के लिए भरा जा सकता है।
जानवरों को अनाज इसलिए खिलाया जाता है ताकि उनमें मांस बढ़े और जिन्हें मांस खाना है उन्हें अच्छा मांस मिल सके। विकासशील देशों में जानवरों को कुल कृषि से उत्पन्न अन्न का लगभग 40% हिस्सा खिला दिया जाता है। भारत जैसे 186 विकासशील देश हैं जो कुल कृषि की उपज का 40% हिस्सा जानवरों को खिला देते हैं। विकसित देशों में जानवरों को कुल कृषि से उत्पन्न अन्न का लगभग 70% हिस्सा खिला दिया जाता है। अमेरिका जैसे दुनिया में 17 विकसित देश हैं। अगर 40% और 70% का औसत निकाला जाए तो 55% निकलता है। अर्थात् दुनिया में औसतन आधा अनाज जानवरों को खिलाकर, उनके मांस को कुछ लोग खाते हैं। इससे अच्छा अगर वो अनाज सीधे ही हम खा जाएँ और जानवरों वाला अनाज मनुष्यों को खाने को मिल जाए तो सारी दुनिया में कहीं भी (एशिया, अफ्रीका में) भूखमरी नहीं होगी। यूएन के अनुसार हर दिन दुनिया में 40,000 लोग भूख से मर जाते हैं। सारी दुनिया में 200 करोड़ लोग भुखमरी की कगार पर हैं अर्थात् दुनिया की करीब 1/3 जनसंख्या भुखमरी की कगार पर है। यूएन की संस्था एफ़एओ (FAO) का कहना है की अगर सारी दुनिया में मांस खाने वाले लोग अपने मांस के उपभोग में सिर्फ 10% की कटौती कर दें या 10% लोग शाकाहारी हो जाएँ तो पूरी दुनिया में एक भी व्यक्ति भूख से नहीं मरेगा।

अमेरिका में हर आदमी एक साल में 165 किलो, चीन में 95 किलो, यूरोप और कनाडा में 130 किलो और भारत में 3.5 किलो मांस प्रतिवर्ष खाता है।

* अब आप सोचेंगे जानवरों के लिए भोजन कहाँ से आयेगा ??
प्रकृति ने बहुत सुंदर व्यवस्था कर राखी है जहां से हमारे लिए भोजन आता है, वहीं से जानवरों के लिए भी पैदा होता है। गेहूं के पौधे का ऊपर वाला लगभग एक फुट का हिस्सा ही हमारे काम आता है और बचा हुआ नीचे का 6-7 फुट जानवरों के काम आता है। इसी तरह मक्का और बाजरा में भी ऊपर का बाल वाला एक फुट हिस्सा हमारे काम आता है और बाकी का जानवरों के काम आता है। मनुष्य के लिए कुल जितना उत्पादन चाहिए उससे 6-7 गुना ज्यादा उत्पादन चारे का हो जाता है।

* मांस उद्योग के कर्ण जंगलों की कटाई: वैज्ञानिकों का कहना है की जंगलों की कटाई का सबसे बड़ा कारण है- मांस उद्योग का बढ़ते जाना। मांस उद्योग में मांस की पैकिंग और उस पैकिंग को एक जगह से दूसरी जगह भेजने के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल है- लकड़ी। जिस कच्चे माल का डिब्बे बनाने में इस्तेमाल होता है। वैज्ञानिकों का कहना है की जंगलों की समाप्ति को अगर रोकना है तो मांस उद्योग को बंद कर दिया जाए।

* मांस उद्योग में पानी की बर्बादी: एक किलो मांस पैदा करने में न्यूनतम 70,000 लीटर पानी लगता है तो 285000000 मीट्रिक टन मांस पैदा करने के लिए 19950000000000000 लीटर पानी बर्बाद होता है।
अर्थात् हम छ: महीने नहाने में जो पानी खर्च करते हैं, उतना ही पानी एक किलो मांस पैदा करने में लग जाता है। अच्छे से अच्छा पानी पीने वाला व्यक्ति अगर एक दिन में 3 लीटर पानी पिये तो महीने में 90 लीटर और साल में 900-1000 लीटर पानी पिएगा। इस तरह 70 साल में वो व्यक्ति 70000 लीटर पानी पिएगा, उतना पानी 1 किलो मांस के उत्पादन में लगता है।
भारत में 20 करोड़ परिवार हैं। मांस पैदा करने वाले उद्योग के लिए एक साल में जितना पानी खर्च होता है उतने ही खर्च में 20 करोड़ परिवारों का सारी ज़िंदगी का पानी का खर्च चल सकता है। एक तरफ भारत ए 14 करोड़ परिवारों को पीने का शुद्ध पानी न मिले और दूसरी तरफ मांस उत्पादन करने वाली कंपनियां लाखों लीटर पानी बर्बाद करें। ये तो बहुत बड़ा अन्याय है ???

* मांस उद्योग के कारण प्राकृतिक आपदाएँ: कत्लखानों में जानवरों को तड़पा तड़पा कर मारा जाता है। बड़े जानवरों को भूखा रखकर उनके शरीर को कमजोर किया जाता है, फिर उनके ऊपर गरम पानी (70-100 डिग्री सेंटीग्रेट) की बौछार डाली जाती है, जिससे उनका शरीर फूलना शुरू हो जाता है। जब उनका शरीर पूरी तरह फूल जाता है तो जीवित अवस्था में ही उनकी खाल को उतारा जाता है। निकालने वाले खून को इकट्ठा किया जाता है और धीरे-2 जानवर मर जाते हैं। इस प्रक्रिया में जानवर बहुत तेज़ चीखते- चिल्लाते हैं। जानवरों की चीखें पूरे वातावरण को तरंगित कर देती हैं और वातावरण में घूमती रहती हैं। इसका वातावरण और मनुष्यों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और यह नकारात्मक प्रभाव जब बढ्ने लगता है तो लोगों में हिंसा की प्रवत्ति बढ्ने लगती है और इस हिंसा और नाकारात्मकता के कारण दुनिया में अत्याचार और पाप बढ़ रहा है।
"दिल्ली विश्वविद्यालय के 3 प्रोफेसर है जिन्होने 20 साल इस पर रिसर्च और अध्ययन किया है ये नाम हैं डॉ॰ मदन मोहन बजाज, डॉ॰ मोहम्मद सैय्यद मोहम्मद इब्राहिम और डॉ। विजय राज सिंह उनकी भौतिकी (Physics) की रिसर्च कहती है की जितना जानवरों को कत्ल किया जाएगा, जानवरों पर जितनी हिंसा की जाएगी, उतना ही अधिक दुनिया में भूकंप आएंगे। उन्होने दुनिया और भारत में जहां जहां कत्लखाने हैं वहाँ रहकर देखा। जानवरों के निकालने वाली Shock Waves को एब्सॉर्ब (Absorb) किया और उनको नापा, तौला और उनका अध्ययन किया और पाया की दुनिया में जो प्राकृतिक आपदाएँ हो रही हैं उनका बहुत बड़ा कारण हैं- कत्लखाने और उनसे निकालने वाली जानवरों की चीख पुकार।

* क्या आप जानते हैं ??
१. कैलिफोर्निया में दुनिया का सबसे बड़ा कत्लखाना है जहां दिन में 36,000 गायों को काटा जाता है।
२. महाराष्ट्र के देवनार में भारत का सबसे बड़ा कत्लखाना है जहां  प्रतिदिन 14,000 गायों को काटा जाता है।

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क्या मोदी सरकार पिछली यूपीए सरकार की तुलना में मीडिया को अपने वश में ज्यादा कर रही हैं? . यह गलत धारणा पेड मीडिया द्वारा ही फैलाई गयी है ...