किसी दार्शनिक ने कहा कि एक झूठ को सौ बार बोलो तो वह सत्य हो जाता है। वैसे ही एक झूठ यह है कि मजहब या धर्म के कारण दंगे होते हैं। मोहम्मद गजनी क्या कोई संत फकीर था ? उसका उददेश्य भारत की संपत्ति लूटना और राज करना था। शासन और संपत्ति के लालच में ही तमाम आक्रमणकारी आये। इतने बडे देश में वह बिना अपनी लाॅबी तैयार किये कैसे शासन कर सकते थे? इसलिये तलवार उठाई और धर्मांतरण कराया। अंग्रेजों का भी यही हाल रहा शिक्षा पद्धति फैलाने से लेकर मेघालय, असम, अरुणांचल, नागालैंड में ईसायत का प्रचार प्रसार प्रभु यीशु के साक्षात्कार के लिये नहीं किया। कभी घनघोर नास्तिक रहे बैरिस्टर जिन्ना को लगा कि मजहब का नाम लेने से उनके वेस्टेज इंटरेस्ट की पूर्ती हो सकती है तो वह कटटर मुसलमान बन गये। जो खुदा को मानना तो दूर प्रचंड नास्तिक थे। मजहब या धर्म के जो ठेकेदार थे उनके कारण दंगे होते रहे। प्रथम विश्व युद्ध के बाद अफगानिस्तान में भी एक कालखंड ऐसा आया जब लोगों को एहसास हुआ कि हम आर्यन हैं। इस राष्ट्रीयता का विरोध करने वाले कुछ सियासी और मजहब के ठेकेदार सामने आ गये और दंगे हुए। ईरान में अयातुल्ला खोमानी को पदच्युत कर दिया गया क्यों ? क्यों कि ईरान में जब यही राष्ट्रीयता जगी तो उन्होंने अपने Pre Islamic Heroes के बारे में सोचना शुरु किया जो साेहराब, रुस्तम, जमशेद, बहराम थे जो ईश्लाम से पहले के ईरान के महापुरुष थे। इसका भी विरोध मजहब की आड में सियासत के ठेकेदारों ने किया। इजिप्ट में भी यही हुआ और तुर्की में मुस्तफा कमाल पाशा आये और उन्होंने कहा कि हम ईश्लाम को मानते हैं, अल्लाह को मानते हैं, मस्जिद को मानते हैं, पैगंबर साहब को मानते हैं लेकिन हमारी राष्ट्रीयता की मांग है कि तुर्की पर अरेबिक संस्कृति का हमला नहीं मानेगें। उन्होंने कुरान को अरबी से तुर्की भाषा में अनुवाद कराया और ईश्लाम का तुर्की के अनुसार परिवर्तन किया। इस परिवर्तन को स्वीकार करने वाले युवा तुर्क और मजहबी कटटरपंथियों के बीच दंगे हुए। इसमें मजहब का दोष नहीं सिर्फ राजनैतिक स्वार्थ के कारण ही रक्तपात हुआ।
बीजेपी के समर्थक है और आलोचक भी | सरकार के प्रत्येक निर्णय पर हम अपने विचार रखने का प्रयास करेंगे |
ईश्वर हमारी सत्य बोलने में मदद करे |
Tuesday, January 28, 2014
Sunday, January 26, 2014
अफ्रीकी देश अंगोला में इस्लाम पर प्रतिबंध, मस्जिदों को बंद करने का आदेश
अफ्रीकी देश अंगोला में इस्लाम पर प्रतिबंध, मस्जिदों को बंद करने का आदेश

अपनी संस्कृति बचाने के लिए कड़ा रुख अपनाया अंगोला ने
इस्लाम धर्म और मुसलमानों पर पाबंदी लगाने वाला अंगोला दुनिया का पहला देश बन गया है. इस आशय की खबरें अफ्रीकी अखबारों में छपी हैं. इसके मुताबिक अफ्रीका महाद्वीप के इस तटीय देश अंगोला की कल्चर मिनिस्टर रोसा क्रूज ने कहा है कि न्याय और मानवाधिकार मंत्रालय ने इस्लाम को हमारे देश में कानूनी वैधता नहीं दी है. ऐसे में अगले नोटिस तक सभी मस्जिदें बंद रहेंगी. इसके अलावा इस तरह की खबरें भी हैं कि सरकार ने मस्जिदों को गिराए जाने का भी आदेश दे दिया है.
मंत्री रोसा के मुताबिक ये फैसला देश में पनप रहे कई अवैध धार्मिक मतों को रोकने की कड़ी में लिया गया है. मंत्री ने यह बयान देश की संसद में दिया और कहा कि अंगोला की संस्कृति के खिलाफ जो भी मत हैं, उन्हें रोकने के लिए यह जरूरी था. इस्लाम के अलावा और भी कई मतों, संप्रदायों पर कानूनी रूप से बंदी की तलवार लटक रही है. इस बारे में मंत्री ने कहा कि हमने जिन संप्रदायों की लिस्ट निकाली है, वे अगले आदेश तक पूजा नहीं कर सकते. उन्हें अपने धार्मिक स्थल और उससे जुड़ी सभी रस्मों को बंद करना होगा.
इस फैसले के बारे में अंगोला के प्रेसिडेंट जोस अडुराडो सांतोस ने कहा कि आखिरकार हमारे देश में इस्लामिक प्रभाव के अंत की आखिरी शुरुआत हो चुकी है.
और भी... http://aajtak.intoday.in/story/angola-bans-islam-muslims-becomes-first-country-to-do-so-1-747863.html
अपनी संस्कृति बचाने के लिए कड़ा रुख अपनाया अंगोला ने
इस्लाम धर्म और मुसलमानों पर पाबंदी लगाने वाला अंगोला दुनिया का पहला देश बन गया है. इस आशय की खबरें अफ्रीकी अखबारों में छपी हैं. इसके मुताबिक अफ्रीका महाद्वीप के इस तटीय देश अंगोला की कल्चर मिनिस्टर रोसा क्रूज ने कहा है कि न्याय और मानवाधिकार मंत्रालय ने इस्लाम को हमारे देश में कानूनी वैधता नहीं दी है. ऐसे में अगले नोटिस तक सभी मस्जिदें बंद रहेंगी. इसके अलावा इस तरह की खबरें भी हैं कि सरकार ने मस्जिदों को गिराए जाने का भी आदेश दे दिया है.
मंत्री रोसा के मुताबिक ये फैसला देश में पनप रहे कई अवैध धार्मिक मतों को रोकने की कड़ी में लिया गया है. मंत्री ने यह बयान देश की संसद में दिया और कहा कि अंगोला की संस्कृति के खिलाफ जो भी मत हैं, उन्हें रोकने के लिए यह जरूरी था. इस्लाम के अलावा और भी कई मतों, संप्रदायों पर कानूनी रूप से बंदी की तलवार लटक रही है. इस बारे में मंत्री ने कहा कि हमने जिन संप्रदायों की लिस्ट निकाली है, वे अगले आदेश तक पूजा नहीं कर सकते. उन्हें अपने धार्मिक स्थल और उससे जुड़ी सभी रस्मों को बंद करना होगा.
इस फैसले के बारे में अंगोला के प्रेसिडेंट जोस अडुराडो सांतोस ने कहा कि आखिरकार हमारे देश में इस्लामिक प्रभाव के अंत की आखिरी शुरुआत हो चुकी है.
और भी... http://aajtak.intoday.in/story/angola-bans-islam-muslims-becomes-first-country-to-do-so-1-747863.html
Friday, January 24, 2014
कुमार बकवास कि नई कविता
कुमार बकवास कि नई कविता - -
कोई बंटी समझता है, कोई बबली समझता है।
मगर कुर्सी की बैचेनी को, बस "कजरी" समझता है।
मैं कुर्सी से दूर कैसा हूँ, मुझसे कुर्सी दूर कैसी है !
फकत शीला समझती है या मेरा दिल समझता है !!
सत्ता एक अहसासों की पावन सी कहानी है !
कभी शीला दीवानी थी कभी कजरी दीवाना है !
-यहाँ सब लोग कहते हैं कजरी सत्ता पिपासु है।
अगर तुम समझो तो ढोंगी है जो ना समझो तो साधू -है। -
समंदर पीर का अन्दर है, लेकिन रो नही सकता !
ये बंगला और ये गाड़ी, मैं इसको खो नही सकता !! -
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना, मगर सुन ले !
जो शीला का न हो पाया, वो मेरा हो नही सकता !!
-भ्रमर कोई अगर कुर्सी पर जा बैठा तो हंगामा!
हमारे दिल में सत्ता का जो ख्वाब आ जाये तो हंगामा!!
-अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा कुर्सी का!
मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा!
कोई बंटी समझता है, कोई बबली समझता है।
मगर कुर्सी की बैचेनी को, बस "कजरी" समझता है।
मैं कुर्सी से दूर कैसा हूँ, मुझसे कुर्सी दूर कैसी है !
फकत शीला समझती है या मेरा दिल समझता है !!
सत्ता एक अहसासों की पावन सी कहानी है !
कभी शीला दीवानी थी कभी कजरी दीवाना है !
-यहाँ सब लोग कहते हैं कजरी सत्ता पिपासु है।
अगर तुम समझो तो ढोंगी है जो ना समझो तो साधू -है। -
समंदर पीर का अन्दर है, लेकिन रो नही सकता !
ये बंगला और ये गाड़ी, मैं इसको खो नही सकता !! -
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना, मगर सुन ले !
जो शीला का न हो पाया, वो मेरा हो नही सकता !!
-भ्रमर कोई अगर कुर्सी पर जा बैठा तो हंगामा!
हमारे दिल में सत्ता का जो ख्वाब आ जाये तो हंगामा!!
-अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा कुर्सी का!
मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा!
Wednesday, January 22, 2014
धरना तो केजरीवाल का मास्टर स्ट्रोक था
अरविंद
केजरीवाल का धरना विफल नहीं रहा है। उन्होंने जो हासिल करना चाहा, वही
हासिल किया। और उनका मकसद तीन-चार पुलिस अफसरों को हटवाना नहीं हो सकता।
उनका गेम प्लान बड़ा था। जब दिल्ली में डैनिश महिला का रेप हुआ तो लोग
अरविंद केजरीवाल सरकार की आलोचना करने लगे। निर्भया रेप केस के सड़क पर
जमकर विरोध ने आम आदमी पार्टी को मजबूत जमीन दिलाई थी। डैनिश महिला के रेप
ने इस जमीन के दरका दिया था। दरार भरने के लिए कुछ बड़ा चाहिए था। और दो
दिन के धरने से अरविंद केजरीवाल ने उसी दरार को भरने के लिए मसाला खोज लिया
अपने इस
धरने से उन्होंने कई निशाने एक साथ साधे हैं। सबसे पहले तो डैनिश महिला के
रेप को लोग भूल गए। साथ ही, उन्होंने सबको यह बहुत अच्छे से बता दिया कि
दिल्ली में कानून-व्यवस्था उनके हाथ में नहीं है। यानी अगली बार जब रेप
होगा (और होगा ही, क्योंकि रेप रोकने के लिए कोई कुछ नहीं कर रहा है,
केजरीवाल भी नहीं) तो जिम्मेदारी बहुत आसानी से दिल्ली पुलिस के सिर होगी।
केजरीवाल ने तो दिखा दिया कि उनके कहने पर तो एक पुलिस अफसर का ट्रांसफर तक
नहीं होता। यानी इस 'कलंक' से उन्होंने मुक्ति पा ली।
फिर,
उन्होंने लोगों को यह भी दिखा दिया कि वह कुर्सी पर भले ही बैठ गए हों,
सड़क को नहीं भूले हैं और जब जरूरत होगी, वह सड़क पर उतर आने, ठिठुरती रात
में जमीन पर सोने के लिए तैयार हैं। उन्होंने लोगों तक यह मेसेज पहुंचा
दिया कि दिल्ली के पूर्ण राज्य के दर्जे के लिए बीजेपी-कांग्रेस अब तक बस
ढकोसला करते आए थे, असली लड़ाई ऐसे लड़ी जाती है।
अपनी जिद
से अरविंद केजरीवाल ने यह साबित कर दिया कि उनके लिए लोकतंत्र और गणतंत्र
के मायने राजपथ पर सैनिकों की परेड में नहीं बल्कि बेहद आम आदमी की जरूरतों
के लिए लड़ने में है। यानी जब लोग उनकी 'आंशिक सफलता' को झेंप बताकर उनकी
खिल्ली उड़ा रहे हैं, वह और बड़ी जीत की ओर बढ़ रहे हैं।
via
विवेक आसरी
Tuesday, January 21, 2014
सोनिया कांग्रेस का ही दूसरा रूप है आआपा
सोनिया कांग्रेस का ही दूसरा रूप है आआपा
अब कारण और रणनीति चाहे जो भी रही होे ह्यआम आदमी पार्टी ह्ण उस स्थिति में पहुंच गई है कि इसकी अवहेलना नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो वह शतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन देने के समान होगा। फिलहाल 'आप' को लेकर हड़बड़ी में जो कहा और लिखा जा रहा है वह रक्षात्मक ज्यादा लगता है और गंभीर विवेचननुमा कम, लहजा कुछ-कुछ सफाई देने जैसा है।
'आप' अपने नेता अरविंद केजरीवाल की सादगी को आगे करती है तो दूसरे राजनैतिक दल भी भागदौड़ करके अपने स्टोर में से कुछ उदहारण ला कर उसका मुकाबला करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। कोई भाग कर गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पारिकर को दिखा रहा है, तो कोई हड़बड़ी में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार को लेकर उपस्थिति हुआ है। जिनकी इतिहास में रुचि है वे कभी लोकसभा के अध्यक्ष रहे रविराय को ओडिशा के किसी कोने से ढूंढ लाए हैं। जिनकी और भी पीछे जाने की हिम्मत है वे गृहमंत्री रह चुके और अब परलोक जा चुके इंद्रजीत गुप्ता को याद कर रहे हैं। यह एक प्रकार से आम आदमी पार्टी की चाल में ही फंसने जैसा है। आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल भी चाहते हैं कि सारी बहस इन्हीं सतही मुद्दों पर घूमती रहे ताकि असली गंभीर मुद्दों से बचा जा सके।
गंभीर और गहरे दूरगामी मुददों पर भारत की राजनीति में बहस ना हो इसको लेकर देश में वातावरण कुछ देशी-विदेशी शक्तियों ने पिछले दो दशकों से ही बनाना शुरू कर दिया था। मीडिया में और विश्वविद्यालयों में यह बहस अच्छा प्रशासन बनाम विचारधाराह के नाम पर चलाई गई थी। इस आंदोलन में यह स्थापित करने की कोशिश की गई थी कि हिंदुस्थान की तरक्की के लिए पहली प्राथमिकता अच्छे प्रशासन की है विचारधारा का राजनीति में ज्यादा महत्व नहीं है। मीडिया की सहायता से सब जगह यह शोर मचाया जाने लगा कि विचारधारा महंगा शौक है जिसे हिंदुस्थान झेल नहीं सकता। हिंदुस्थान को तो अच्छा प्रशासन चाहिए इसी आंदोलन में से भ्रष्टाचार समाप्त करने के स्वर उभरने लगे थे और इसी आंदोलन में देशवासियों में राजनैतिक नेतृत्व और संवैधानिक व्यवस्थाओं के प्रति अनास्था का वातावरण तैयार किया। इस आंदोलन को चलाने वाले लोगों ने बहुत शातिराना अंदाज से यह बात गोल कर दी कि अच्छा प्रशासन या भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की कल्पना एकांत में नहीं की जा सकती। आंदोलन चलाने वालों ने बहुत ही शातिर तरीके से अच्छे प्रशासन अथवा भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन को विचारधारा के खिलाफ खड़ा कर दिया। ऐसा माहौल बनाया गया मानो विचारधारा और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन एक दूसरे के विरोधी हों और हिन्दुस्थान को यदि आगे बढ़ना है तो उसे विचारधारा को त्यागना होगा। जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। सत्ता का वैचारिक आधार कोई भी, साम्यवादी, मिश्रित अर्थव्यवस्था, एकात्म मानवतावादी, पूंजीवादी या फिर माओवादी ही क्यों न हो अच्छा प्रशासन तो सभी वैचारिक व्यवस्थाओं के लिए अनिवार्य शर्त है।
मुख्य प्रश्न यह है कि हिन्दुस्थान में पिछले दो दशकों में हड़बड़ी में सुप्रशासन और विचारधारा को एक दूसरे के खिलाफ सिद्घ करने का आंदोलन चलने की जरूरत क्यों पड़ी ? भारत में कुल मिलाकर तीन वैचारिक प्रतिष्ठान आसानी से चिन्हित किए जा सकते हैं। विभिन्न साम्यवादी दलों के नेतृत्व में साम्यवादी वैचारिक मंडल और संघ परिवार के नेतृत्व में एकात्ममानव दर्शन पर आधारित भारतीय वैचारिक मंडल। तीसरा खेमा, जिसे सही अर्थो में वैचारिक मंडल नहीं कहा जा सकता, सोनिया गांधी की पार्टी का है जिसमें सत्ता सुख भोगने के लालच में विभिन्न विचारधाराओं के वाहक अपनी सुविधा अनुसार एक छतरी के नीचे एकत्रित हैं। इस खेमे में नक्सलवाद से लेकर हिन्दुओं की चर्चा करने वालों तक, विशुद्घ पूंजीवाद से लेकर शत-प्रतिशत राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था तक के पक्षधर भी हैं। इसमें अभी भी मुसलमानों को अलग राष्ट्र मानने के पक्षधर हैं और ईसाई स्थान का सपना संजोने वाले भी ही इस खेमे में शामिल हैं। बाबरी ढांचे के टूटने पर खून की नदियां बहाने की धमकियां देने से लेकर शयनगृह में छिप कर ताली बजाने वाले भी इसी खेमे में है। अमेरिका के आगे दंडवत करने वाले भी इसी खेमे में है और उसे सबक सिखाने वाले भी इसी खेमे में है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस खेमे की न कोई अपनी पहचान है और न ही कोई प्रतिबद्घता। भारत की राजनीति में जिन देशी-विदेशी शक्तियों के अपने निहित स्वार्थ हैं उनके लिए सोनिया गांधी की पार्टी जैसा खेमा ही सबसे ज्यादा अनुकू ल होता है। सोवियत रूस के पतन के बाद अमरीका के लिए साम्यवादी वैचारिक मंडलों की चुनौती एक प्रकारी से समाप्त हो गई थी। भारत में इसकी शक्ति पहले भी पश्चिमी बंगाल में ही सिमट कर रह गई थी और इसे निर्णायक चोट ममता बनर्जी ने पहुंचा ही दी थी। इसलिए इतना स्पष्ट ही था कि आने वाले समय में भारत की राजनीति में मुख्य दंगल संघ परिवार के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों के भारतीय वैचारिक मंडल और सोनिया गांधी की पार्टी और उसके सहयोगी खेमे में होने वाला है।
मान लीजिए सोनिया गांधी पार्टी का खेमा हार जाता है तो भारत की सत्ता के केंद्र में भारतीय वैचारिक प्रतिष्ठान स्थापित हो सकता है, और यदि उसने अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल के प्रयोगों से सबक हासिल कर लिया तो वह लंबे समय तक इस केंद्र में रह भी सकता है। सैम्युअल हंटिंगटन ने जिन सभ्यताओं के संघर्ष की भविष्यवाणी की है, उसके अनुसार भारत में राष्ट्रवादी शक्तियों के केंद्र में आ जाने से भारतीय संस्कृति और सभ्यता एक बार फिर विश्व में अपना सम्मानपूर्वक स्थान ग्रहण कर सकती है। इसलिए भारत में रुचि लेने वाली देशी- विदेशी शक्तियों को हर हालत में कांग्रेस-1 के पराजित हो जाने पर कांग्रेस-2 को स्थापित करने के प्रयास करने ही थे। लगता है कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस-1 के स्थान पर कांग्रेस-2 के रूप में ही आगे बढ़ाई जा रही है। यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल उन सब प्रश्नों पर बात करने से बचते हैं जो इस देश के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। आश्चर्य है कि जब कभी इन मुददों पर विवशता में बोलते भी हैं तो उनके विचारों में और कांग्रेस-1 के विचारों में कोई मौलिक अंतर दिखाई नहीं देता। कश्मीर में जनमत संग्रह कराने के प्रश्न पर जो बात पिछले पांच दशकों से कांग्रेस कह रही है, पाकिस्तान कह रहा है, आतंकवादी कह रहे हैं वही बात इस पार्टी के प्रशांत भूषण कह रहे हैं। अनुच्छेद 370 पर आम आदमी पार्टी की वही राय है जो कांग्रेस (आई) की है। आतंकवाद पर भारत और माओवाद प्रभावित राज्यों से सेना को हटाने या फिर वहां उनकी शक्ति को अत्यंत क्षीण करने की बात कांग्रेस-1 भी कह रही है और आम आदमी पार्टी भी कह रही है। कांग्रेस (आई) भी यह मान कर चलती है कि इस देश में मुसलमानों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है और उनके लिए अलग से कानून बनाया जाना चाहिए। मोटे तौर पर ह्यआम आदमी पार्टी ह्णभी यही कहती है। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह भी यह कहते हैं कि इस देश में जहां भी मुस्लिम आतंकवादी मारा जाता है वह फर्जी एनकांउटर होता है। केजरीवाल की पार्टी का भी यही मत है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मामले में आम आदमी पार्टी को भी यही लगता है कि उनका ऑडिट कर देने से समस्या हल हो जाएगी।
ये केवल कुछ उदाहरण हैं । मोटे तौर पर नीति के मामले में सोनिया गांधी की पार्टी और आम आदमी पार्टी में कोई अंतर नहीं है। बहस केवल इस बात को लेकर हो रही है कि इनके प्रशासन में भ्रष्टाचार बहुत ज्यादा है' जब हम आएंगे भ्रष्टाचार को खत्म करने की कोशिश करेंगे। जहां तक वैचारिक नीति का प्रश्न है 'आप' भी कांग्रेस का ही प्रतिरूप है इसलिए जिन पूंजीवादी प्रतिष्ठानों को सोनिया कांग्रेस के गिरने का खतरा दिखाई देता है उन्होंने तुरंत 'आप' पर दांव लगाना शुरू कर दिया है क्योंकि उन्हे लगता है'आप' से वैचारिक नीतिगत निरंतरता बनी रहेगी। इसलिए देशी-विदेशी शक्तियों के गर्हित हित प्रभावित नहीं होंगे। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यदि राष्ट्रवादी शक्तियां सत्ता में आ जाती हैं तो सभ्यताओं के संघर्ष में एक ऐसी सभ्यता फिर से अंगड़ाई लेने लगेगी जिसे अभी तक विश्व शक्तियों ने हाशिए पर धकेल रखा है।
अब कारण और रणनीति चाहे जो भी रही होे ह्यआम आदमी पार्टी ह्ण उस स्थिति में पहुंच गई है कि इसकी अवहेलना नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो वह शतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन देने के समान होगा। फिलहाल 'आप' को लेकर हड़बड़ी में जो कहा और लिखा जा रहा है वह रक्षात्मक ज्यादा लगता है और गंभीर विवेचननुमा कम, लहजा कुछ-कुछ सफाई देने जैसा है।
'आप' अपने नेता अरविंद केजरीवाल की सादगी को आगे करती है तो दूसरे राजनैतिक दल भी भागदौड़ करके अपने स्टोर में से कुछ उदहारण ला कर उसका मुकाबला करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। कोई भाग कर गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पारिकर को दिखा रहा है, तो कोई हड़बड़ी में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार को लेकर उपस्थिति हुआ है। जिनकी इतिहास में रुचि है वे कभी लोकसभा के अध्यक्ष रहे रविराय को ओडिशा के किसी कोने से ढूंढ लाए हैं। जिनकी और भी पीछे जाने की हिम्मत है वे गृहमंत्री रह चुके और अब परलोक जा चुके इंद्रजीत गुप्ता को याद कर रहे हैं। यह एक प्रकार से आम आदमी पार्टी की चाल में ही फंसने जैसा है। आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल भी चाहते हैं कि सारी बहस इन्हीं सतही मुद्दों पर घूमती रहे ताकि असली गंभीर मुद्दों से बचा जा सके।
गंभीर और गहरे दूरगामी मुददों पर भारत की राजनीति में बहस ना हो इसको लेकर देश में वातावरण कुछ देशी-विदेशी शक्तियों ने पिछले दो दशकों से ही बनाना शुरू कर दिया था। मीडिया में और विश्वविद्यालयों में यह बहस अच्छा प्रशासन बनाम विचारधाराह के नाम पर चलाई गई थी। इस आंदोलन में यह स्थापित करने की कोशिश की गई थी कि हिंदुस्थान की तरक्की के लिए पहली प्राथमिकता अच्छे प्रशासन की है विचारधारा का राजनीति में ज्यादा महत्व नहीं है। मीडिया की सहायता से सब जगह यह शोर मचाया जाने लगा कि विचारधारा महंगा शौक है जिसे हिंदुस्थान झेल नहीं सकता। हिंदुस्थान को तो अच्छा प्रशासन चाहिए इसी आंदोलन में से भ्रष्टाचार समाप्त करने के स्वर उभरने लगे थे और इसी आंदोलन में देशवासियों में राजनैतिक नेतृत्व और संवैधानिक व्यवस्थाओं के प्रति अनास्था का वातावरण तैयार किया। इस आंदोलन को चलाने वाले लोगों ने बहुत शातिराना अंदाज से यह बात गोल कर दी कि अच्छा प्रशासन या भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की कल्पना एकांत में नहीं की जा सकती। आंदोलन चलाने वालों ने बहुत ही शातिर तरीके से अच्छे प्रशासन अथवा भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन को विचारधारा के खिलाफ खड़ा कर दिया। ऐसा माहौल बनाया गया मानो विचारधारा और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन एक दूसरे के विरोधी हों और हिन्दुस्थान को यदि आगे बढ़ना है तो उसे विचारधारा को त्यागना होगा। जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। सत्ता का वैचारिक आधार कोई भी, साम्यवादी, मिश्रित अर्थव्यवस्था, एकात्म मानवतावादी, पूंजीवादी या फिर माओवादी ही क्यों न हो अच्छा प्रशासन तो सभी वैचारिक व्यवस्थाओं के लिए अनिवार्य शर्त है।
मुख्य प्रश्न यह है कि हिन्दुस्थान में पिछले दो दशकों में हड़बड़ी में सुप्रशासन और विचारधारा को एक दूसरे के खिलाफ सिद्घ करने का आंदोलन चलने की जरूरत क्यों पड़ी ? भारत में कुल मिलाकर तीन वैचारिक प्रतिष्ठान आसानी से चिन्हित किए जा सकते हैं। विभिन्न साम्यवादी दलों के नेतृत्व में साम्यवादी वैचारिक मंडल और संघ परिवार के नेतृत्व में एकात्ममानव दर्शन पर आधारित भारतीय वैचारिक मंडल। तीसरा खेमा, जिसे सही अर्थो में वैचारिक मंडल नहीं कहा जा सकता, सोनिया गांधी की पार्टी का है जिसमें सत्ता सुख भोगने के लालच में विभिन्न विचारधाराओं के वाहक अपनी सुविधा अनुसार एक छतरी के नीचे एकत्रित हैं। इस खेमे में नक्सलवाद से लेकर हिन्दुओं की चर्चा करने वालों तक, विशुद्घ पूंजीवाद से लेकर शत-प्रतिशत राज्य नियंत्रित अर्थव्यवस्था तक के पक्षधर भी हैं। इसमें अभी भी मुसलमानों को अलग राष्ट्र मानने के पक्षधर हैं और ईसाई स्थान का सपना संजोने वाले भी ही इस खेमे में शामिल हैं। बाबरी ढांचे के टूटने पर खून की नदियां बहाने की धमकियां देने से लेकर शयनगृह में छिप कर ताली बजाने वाले भी इसी खेमे में है। अमेरिका के आगे दंडवत करने वाले भी इसी खेमे में है और उसे सबक सिखाने वाले भी इसी खेमे में है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस खेमे की न कोई अपनी पहचान है और न ही कोई प्रतिबद्घता। भारत की राजनीति में जिन देशी-विदेशी शक्तियों के अपने निहित स्वार्थ हैं उनके लिए सोनिया गांधी की पार्टी जैसा खेमा ही सबसे ज्यादा अनुकू ल होता है। सोवियत रूस के पतन के बाद अमरीका के लिए साम्यवादी वैचारिक मंडलों की चुनौती एक प्रकारी से समाप्त हो गई थी। भारत में इसकी शक्ति पहले भी पश्चिमी बंगाल में ही सिमट कर रह गई थी और इसे निर्णायक चोट ममता बनर्जी ने पहुंचा ही दी थी। इसलिए इतना स्पष्ट ही था कि आने वाले समय में भारत की राजनीति में मुख्य दंगल संघ परिवार के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों के भारतीय वैचारिक मंडल और सोनिया गांधी की पार्टी और उसके सहयोगी खेमे में होने वाला है।
मान लीजिए सोनिया गांधी पार्टी का खेमा हार जाता है तो भारत की सत्ता के केंद्र में भारतीय वैचारिक प्रतिष्ठान स्थापित हो सकता है, और यदि उसने अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल के प्रयोगों से सबक हासिल कर लिया तो वह लंबे समय तक इस केंद्र में रह भी सकता है। सैम्युअल हंटिंगटन ने जिन सभ्यताओं के संघर्ष की भविष्यवाणी की है, उसके अनुसार भारत में राष्ट्रवादी शक्तियों के केंद्र में आ जाने से भारतीय संस्कृति और सभ्यता एक बार फिर विश्व में अपना सम्मानपूर्वक स्थान ग्रहण कर सकती है। इसलिए भारत में रुचि लेने वाली देशी- विदेशी शक्तियों को हर हालत में कांग्रेस-1 के पराजित हो जाने पर कांग्रेस-2 को स्थापित करने के प्रयास करने ही थे। लगता है कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस-1 के स्थान पर कांग्रेस-2 के रूप में ही आगे बढ़ाई जा रही है। यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल उन सब प्रश्नों पर बात करने से बचते हैं जो इस देश के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। आश्चर्य है कि जब कभी इन मुददों पर विवशता में बोलते भी हैं तो उनके विचारों में और कांग्रेस-1 के विचारों में कोई मौलिक अंतर दिखाई नहीं देता। कश्मीर में जनमत संग्रह कराने के प्रश्न पर जो बात पिछले पांच दशकों से कांग्रेस कह रही है, पाकिस्तान कह रहा है, आतंकवादी कह रहे हैं वही बात इस पार्टी के प्रशांत भूषण कह रहे हैं। अनुच्छेद 370 पर आम आदमी पार्टी की वही राय है जो कांग्रेस (आई) की है। आतंकवाद पर भारत और माओवाद प्रभावित राज्यों से सेना को हटाने या फिर वहां उनकी शक्ति को अत्यंत क्षीण करने की बात कांग्रेस-1 भी कह रही है और आम आदमी पार्टी भी कह रही है। कांग्रेस (आई) भी यह मान कर चलती है कि इस देश में मुसलमानों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है और उनके लिए अलग से कानून बनाया जाना चाहिए। मोटे तौर पर ह्यआम आदमी पार्टी ह्णभी यही कहती है। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह भी यह कहते हैं कि इस देश में जहां भी मुस्लिम आतंकवादी मारा जाता है वह फर्जी एनकांउटर होता है। केजरीवाल की पार्टी का भी यही मत है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मामले में आम आदमी पार्टी को भी यही लगता है कि उनका ऑडिट कर देने से समस्या हल हो जाएगी।
ये केवल कुछ उदाहरण हैं । मोटे तौर पर नीति के मामले में सोनिया गांधी की पार्टी और आम आदमी पार्टी में कोई अंतर नहीं है। बहस केवल इस बात को लेकर हो रही है कि इनके प्रशासन में भ्रष्टाचार बहुत ज्यादा है' जब हम आएंगे भ्रष्टाचार को खत्म करने की कोशिश करेंगे। जहां तक वैचारिक नीति का प्रश्न है 'आप' भी कांग्रेस का ही प्रतिरूप है इसलिए जिन पूंजीवादी प्रतिष्ठानों को सोनिया कांग्रेस के गिरने का खतरा दिखाई देता है उन्होंने तुरंत 'आप' पर दांव लगाना शुरू कर दिया है क्योंकि उन्हे लगता है'आप' से वैचारिक नीतिगत निरंतरता बनी रहेगी। इसलिए देशी-विदेशी शक्तियों के गर्हित हित प्रभावित नहीं होंगे। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यदि राष्ट्रवादी शक्तियां सत्ता में आ जाती हैं तो सभ्यताओं के संघर्ष में एक ऐसी सभ्यता फिर से अंगड़ाई लेने लगेगी जिसे अभी तक विश्व शक्तियों ने हाशिए पर धकेल रखा है।
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Paid मीडिया का रोल
क्या मोदी सरकार पिछली यूपीए सरकार की तुलना में मीडिया को अपने वश में ज्यादा कर रही हैं? . यह गलत धारणा पेड मीडिया द्वारा ही फैलाई गयी है ...
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भारत की वकालत करने वाले इसे पुरातन संस्कृति से जोड़कर देखते हैं। भारत के नाम का भी महत्व इस तरह बताया जाता है कि यह महान राजा भरत के नाम पर...
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Please read : - http://en.wikipedia.org/wiki/Macaulayism 1858 में अंग्रेजोँ द्वारा Indian Education Act बनाया गया | इसकी ड्राफ्टिंग लोर्ड ...
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क्या आप जानते हैं कि...... इस्लाम में बुर्के की शुरुआत क्यों और कैसे हुई है...???? दरअसल ... बुर्के की कहानी जानने से पहले हमें आज से लगभग...

