Sunday, September 8, 2013

डॉ नरेंदर दाभोलकर और अन्धविश्वास

डॉ नरेंदर दाभोलकर और अन्धविश्वास

स्वर्गीय डॉ नरेंदर दाभोलकर जी की हत्या किया जाना निश्चित रूप से कायरता का प्रतिक हैं और हम इसकी खुले रूप से भ्रत्सना करते हैं। श्री दाभोलकर अन्धविश्वास उनर्मिलन के लिए राज्य सरकार द्वारा कानून बनवाने के लिए पिछले १५ वर्षों से प्रयासरत थे। आप एक ऐसा कानून बनवाना चाहते थे जिससे जादू-टोना, भस्म-भभूत, चमत्कारी शक्तियाँ, अवतारवाद के नाम पर धोखा, उपरी छाया, अघोरी द्वारा तंत्र मंत्र करना, पुत्र प्राप्ति के लिए अनुष्ठान, अभिमंत्रित नगीने, पत्थर आदि, भुत प्रेतादि का मनुष्य के शरीर में प्रवेश, पशुबलि, नरबली, जादूगरी, कुत्ता काटे, साँप काटे का ईलाज, नामर्दगी और भांझपन का ईलाज आदि क़ानूनी रूप से न केवल वर्जित हो अपितु दंडनीय भी हो।

ऊपर से देखने में सभ्य समाज आपको बड़ा बुद्धिजीवी और प्रगतिशील मानकर आपकी इस कार्य में प्रशंसा अवश्य करेगा और आपका इस कार्य में साथ अवश्य देना चाहेगा परन्तु सत्य कुछ और भी हैं।
डॉ नरेंदर ने इस कानून के साथ साथ कुछ अन्य कार्यों का भी विरोध किया हैं जैसे होली के पर्व पर आशाराम बापू द्वारा चंद टैंकर पानी को रंग मिला कर इस्तेमाल करना जबकि उस समय महाराष्ट्र में सुखा पड़ा था। जैसे गणपति उत्सव के समय समुद्र में गणेश की मूर्तियों को विसर्जन करने में पर्यावरण को नुकसान होने की बात कहना।
पाठक अभी तक सोच रहे होगे की ऐसे व्यक्ति का तो अवश्य साथ देना चाहिए मगर यहाँ आप और भी कुछ नहीं देख पा रहे हैं।
अन्धविश्वास केवल हिन्दू समाज की मिलकियत नहीं हैं, संसार का ऐसा कोई भी मत नहीं होगा जिसमें अन्धविश्वास किसी न किसी रूप में नहीं मिलता हैं। जैसे

१. ईद के अवसर पर लाखों निरपराध पशुओं को बेवजह मारा जाता हैं जिससे पर्यावरण को अत्यधिक नुक्सान होता हैं। डॉ दाभोलकर चूँकि यह मामला मुस्लिम समाज से सम्बंधित था चुप क्यूँ रहे। क्या यह मामला अन्धविश्वास से सम्बंधित नहीं था?

२. क्या केवल प्रदुषण गणपति उत्सव पर ही होता हैं जोकि वर्ष में एक दिन के लिए बनता हैं जबकि हर रोज लाखों निरीह पशुयों को माँस के लिए बूचड़खानों में नहीं मारा जाता हैं, उनको मारने के लिए कसाई खानों में लाखों लीटर पानी इस्तेमाल होता हैं, उससे होने वाला प्रदुषण क्या प्रदुषण नहीं हैं? या फिर यह भी मुसलमानों से सम्बंधित होने के कारण यह त्याज्य हैं।
३. जितनी भी मुसलमानों की दरगाहे, मजारे, कब्रें आदि हैं ,वहाँ पर यह अन्धविश्वास प्रचलित हैं की मरे हुए मुर्दे
में बिमारियों को ठीक करने की, परीक्षा में अंकों की, बेरोजगारों को नौकरी की, बेऔलादों को औलाद मिलती हैं। फिर डॉ नरेंदर जी ने भारत देशभर में फैली हजारों कब्रों को उखाड़ने के लिए किसी भी कानून को बनाने के लिए क्यूँ प्रयास नहीं किया ? क्या कब्र पूजा अन्धविश्वास नहीं हैं?

४. ईसाई समाज प्रार्थना से चंगाई होना मानता हैं अर्थात किसी भी प्रकार की बीमारी हो आपको डॉक्टर, दवाई आदि की आवश्यकता नहीं हैं। आप चर्च जाये, प्रभु ईसा मसीह की पूजा करे, उनपर विश्वास लाये आप चंगे हो जायेगे। जीवन भर बीमार रहने वाली सिस्टर अलफोंसो, अपने जीवन में पार्किन्सन रोग के कारण व्हील चेयर पर अपने अंतिम वर्ष बिताने वाले पूर्व पोप जॉन पॉल द्वित्य, स्वास्थ्य कारणों के कारण अपने कार्यकाल के पूरा होने से पहले अपना त्यागपत्र देने वाले पूर्व पोप बेनेडिक्ट , जीवन में तीन बार अपनी शल्य चिकित्सा करवाने वाली विश्व विख्यात मदर टेरेसा सभी ईसा मसीह पर विश्वास लाते थे मगर दुआ से ज्यादा दवा पर भरोसा करते थे फिर भी ईसाई समाज प्रार्थना से चंगाई जैसे अन्धविश्वास को प्रोत्साहन दे रहा हैं। डॉ नरेंदर जी ने कभी

ईसाई समाज के इस अन्धविश्वास के विरुद्ध नहीं बोल क्यूँ?
ऐसे अनेक उदहारण हम सभी मतों में से दे सकते हैं।
मगर हमारा उद्देश्य यहाँ पर मतों की निंदा करना नहीं हैं।
अपितु यह सन्देश देना हैं की धर्म और अन्धविश्वास में अंतर समझना बेहद आवश्यक हैं और अन्धविश्वास की तिलांजलि देने के लिए धर्म की तिलांजलि देना आवश्यक नहीं हैं जैसा डॉ नरेंदर जी ने अपने जीवन में किया था।
डॉ नरेंदर जी की अन्धविश्वास विवेचना का समर्थन करने से व्यक्ति नास्तिक बन जाता हैं जो स्वयं एक प्रकार का अन्धविश्वास हैं। आस्तिक व्यक्ति अपने से शक्तिशाली ईश्वर की सत्ता को मानने के कारण पाप कर्म को जान बुझ कर नहीं करता और अगर करता भी हैं अज्ञानता के कारण जबकि नास्तिक व्यक्ति के लिए केवल भोगवाद ही जीवन का उद्देश्य रह जाता हैं इसलिए भोगवाद के गर्त में पड़कर वह एक से बढ़कर एक पाप कर्म करता हैं।
धर्म और अन्धविश्वास में अंतर को समझना आवश्यक है। जब मनुष्य ईश्वर के अनुसार अपने कार्यों को करता हैं तब वह धर्म का पालन कर रहा होता हैं और जब मनुष्य अपने अनुसार ईश्वर के कार्यों का निर्धारण करने लगता हैं तब वह धर्म के स्थान पर अन्धविश्वास का पालन करने लगता हैं।

जिन जिन अंधविश्वासों का ऊपर वर्णन किया गया हैं या तो वे मनुष्य की अल्पबुद्धि की देन हैं अथवा ईश्वर की आज्ञा का गलत अनुसरण हैं।
जैसे वेदों में पशुओं के साथ भी मित्रों के समान व्यवहार करने का सन्देश हैं फिर यह कैसे ही सकता हैं की वेदों में यज्ञ में पशुबलि का विधान हो।
जैसे कुरान में अल्लाह को रहीम अर्थात दयालु बताया गया हैं फिर यह कैसे हो सकता हैं की वही अल्लाह अपनी इच्छा के लिए ईद के अवसर पर लाखों पशुओं की मृत्यु का कारण बने।

यह सब गड़बड़ ईश्वर द्वारा नहीं अपितु मनुष्य द्वारा की गई हैं।

इसका समाधान भी वही हैं जो महात्मा ज्योतिबा फुले और महागोविन्द राणाडे के मार्गदर्शक, डॉ अम्बेडकर से आधी सदी पहले अन्धविश्वास और जातिवाद के विरुद्ध उद्घोष करने वाले स्वामी दयानंद सरस्वती ने किया था।

स्वामी दयानंद ने न केवल पाखंड के, अन्धविश्वास के विरूद्ध उद्घोष किया अपितु वेदों में वर्णित सच्चे परमेश्वर की परिभाषा को समाज के कल्याण के लिए पुन: स्थापित कर समाज को सच्चा आस्तिक भी बनाया था। उनका उद्देश्य मत-मतान्तर के भेद भाव को मिटाकर धर्म की पुन: स्थापना था।

धर्म की परिभाषा उन्होंने धार्मिक कृत्य न बताकर धैर्य, क्षमा, मन को प्राकृतिक प्रलोभनों में फँसने से रोकना, चोरी त्याग, शौच, इन्द्रिय निग्रह, बुद्धि अथवा ज्ञान, विद्या, सत्य और अक्रोध धर्म के दस लक्षण के रूप में बताया था।

मनुष्य के आचरण को सर्वोपरि बताते हुए उन्होंने कहा की जो पक्षपात रहित न्याय सत्य का ग्रहण, असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार हैं उसी का नाम धर्म और उससे विपरीत का अधर्म हैं। धर्म की इस परिभाषा को संसार का कोई भी तथष्ट व्यक्ति अस्वीकार नहीं कर सकता फिर हमें अन्धविश्वास के परित्याग के लिए नास्तिक बनने की क्या आवश्यकता हैं।

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