Wednesday, July 10, 2013

मुस्लिम तुष्टीकरण के नाम पर आतंकवाद का पुष्टीकरण

मुस्लिम तुष्टीकरण के नाम पर आतंकवाद का पुष्टीकरण

गुजरात पुलिस और केन्द्रीय खुफिया ब्यूरो (इंटेलिजेंस ब्यूरो) के संयुक्त ऑपरेशन में १५ जून २००४ को मारी गई मुस्लिम युवती इशरत जहां के मामले में सीबीआई चार्जशीट के साथ ही कांग्रेस समेत छद्म सेकुलरों ने ऐसा स्यापा शुरू किया है मानो इस देश में अब कोई मुसलमान सुरक्षित नहीं है। यह पहला मामला नहीं जब मुस्लिम मतों के लालची लोगों द्वारा ऐसा किया जा रहा है। आतंकवाद को मजहबी सहानुभूति से जोड़कर 1980 के दशक में कश्मीरी मुसलमानों को भड़काया गया था। तीन दशक बाद अब फिर आतंकी गतिविधि का मजहबीकरण कर वोट बैंक की राजनीति करने वाले आतंक विरोधी अभियान की कमर तोड़ने पर आमादा हैं।
1980 के दशक में मकबूल बट्ट की फांसी की सजा को कश्मीर में मुस्लिम युवकों के साथ अत्याचार के रूप में प्रचारित किया गया। परिणामस्वरूप जिस कश्मीर घाटी को पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई पूरे ४ दशकों तक शेख अब्दुल्ला से सौदा करके भी हिंदुस्तान के विरोध में खड़ा नहीं कर पाई थी वही कश्मीर ५ साल के भीतर पाकिस्तान परस्ती में पागलपन की हद तक अलगाववादी हो गया। इक्कीसवीं सदी में जब कश्मीर का अलगाववाद हिंदुस्तानी जवानों की शहादत और पराक्रम के बल पर आखिरी सांसें गिनने को मजबूर हुआ है तब उसी मकबूल बट्ट की कब्र के बगल में दफन अफजल गुरु की फांसी पर शेख अब्दुल्ला का पोता उमर अब्दुल्ला खुद अलगाववादी बीन बजा रहा है।
सेकुलरवाद की नल्ली-निहारी
1980 के दशक में इंदिरा गांधी के राजनीतिक नौसिखिया बेटे राजीव गांधी ने शेख अब्दुल्ला के बेटे फारुख अब्दुल्ला पर विश्वास करने की गलती की थी। इक्कीसवीं सदी में वही गलती राजीव गांधी का बेटा राहुल गांधी उमर अब्दुल्ला की दोस्ती पर अंधविश्वास करके कर रहा है। राजीव गांधी ने शाहबानो के मसले पर मुल्लों की दाढ़ी में मक्खन लगाने का जो तुष्टीकरण किया उससे सेकुलरवाद को मुल्लावाद ने नल्ली-निहारी समझ कर चूस लिया। आज इशरत पर कांग्रेसी जिस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं उससे देश का सुरक्षातंत्र ऐसे दौर में पहुंच जाएगा जिसमें आतंकी सक्रियता पर ‘सोर्स रिपोर्ट’ देने में आईबी के आला अफसर कांप जाया करेंगे। आतंकियों पर गोली चलाने से सुरक्षा बल संकोच करने लगेंगे। पहले हम समझ लें कि मकबूल बट्ट पर हमारा तंत्र कहां चूका था। अफजल गुरु पर पूरा तंत्र कैसे घनचक्कर बना? और इशरत जहां के चक्कर में तुष्टीकरण किसे पुष्ट कर रहा है? 1964 में जब पं. जवाहरलाल नेहरू ने आखिरी दिनों में शेख अब्दुल्ला को रिहा किया तब शेख ने पाकिस्तान की तत्कालीन हुकूमत को विश्वास दिलाया था कि जब पाकिस्तानी सेना कश्मीर में घुसेगी तो कश्मीरी पाकिस्तानियों का साथ देंगे। रिसर्च एंड एनालायसिस विंग (रॉ) तब तक नहीं स्थापित हुई थी, तब आईबी पर ही देशी और विदेशी यूनिट से समग्र खुफिया तंत्र का भार था।
जेकेएनएलएफ था पहला आतंकी संगठन
आईबी की विदेशी इकाई कालांतर में रॉ बनी। रॉ के पूर्ववर्ती अफसरों ने शेख अब्दुल्ला और पाकिस्तानी शासकों के संपर्क के प्रति हिंदुस्तान सरकार को एलर्ट दिया था। इसलिए जब पाकिस्तानी सेना कश्मीर की ओर बढ़ी तब हिंदुस्तानी सेना ने पंजाब से हमला कर लाहौर और रावलपिंडी को हमले की जद में ले लिया। पाकिस्तान को समझौते के लिए ताशकंद भागना पड़ा था। तब आईएसआई ने पहली बार जम्मू एंड कश्मीर नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जेकेएनएलएफ) नामक पहला आतंकी संगठन बनाया। जेकेएनएलएफ के आतंक की कमान मकबूल बट्ट को थमाई गई। 14 सितंबर 1966 को मकबूल बट्ट ने अपने दो साथियों औरंगजेब तथा काला खान के साथ कश्मीरी पुलिस पर पहला आतंकी हमला किया। इस हमले में लोकल क्राइम ब्रांच सीआईडी के इंस्पेक्टर अमर चंद की मौत हो गई। जवाबी फायरिंग में औरंगजेब मारा गया। मकबूल बट्ट और काला खान गिरफ्तार किए गए। अदालत ने मकबूल बट्ट को मृत्युदंड की सजा मुकर्रर की। 1968 में जेल अधिकारियों की मिलीभगत से श्रीनगर जेल में लंबी सुरंग खोदकर मकबूल बट्ट दो अन्य कैदियों के साथ पाकिस्तान भाग गया। पाकिस्तान में मकबूल बट्ट कुछ अरसे के लिए गिरफ्तार किया गया, पर जब 1970-71 में बांग्लादेश के मुद्दे पर हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा तो मकबूल बट्ट के षड्यंत्र में इंडियन एयरलाइंस का एक विमान अपहृत कर लिया। विमान और उसके यात्रियों को बंधक बना कर लाहौर ले जाया गया। अंतर्राष्ट्रीय दबाव में पाकिस्तान ने जम्मू एंड कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के तत्कालीन प्रमुख मकबूल बट्ट को गिरफ्तार किया। 1974 में जब उसे रिहा किया गया तो २ साल बाद 1976 में बट्ट सीमा पार कर हिंदुस्तान में घुस आया। कुछ दिनों बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया। बट्ट को मृत्युदंड की सजा पहले ही सुनाई गई थी सो नए मामलों के बाद वह मृत्युदंड की सजा का स्वाभाविक पात्र था।
...और आतंकी के नाम शहादत दिवस
कुछ मानवाधिकार संगठनों की मदद से 1980 के दशक में मकबूल बट्ट ने राष्ट्रपति के पास क्षमादान की याचिका दायर कर रखी थी। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह मकबूल बट्ट की याचिका पर कोई फैसला करते उसी दौरान 3 फरवरी 1984 को ब्रिटेन के हिंदुस्तानी उच्चायुक्त रवींद्र म्हात्रे का अपहरण हो गया। म्हात्रे का अपहरण जेकेएलएफ ने किया था और बदले में मकबूल बट्ट की रिहाई मांगी गई। इंदिरा गांधी की सरकार ने आतंकियों की मांग को ठुकरा दिया। 6 फरवरी 1984 को रवींद्र म्हात्रे का आतंकियों ने कत्ल कर दिया। नाराज इंदिरा सरकार ने एक सप्ताह के भीतर मकबूल बट्ट की क्षमादान याचिका पर विधिक प्रक्रिया पूरी कर ११ फरवरी 1984 को उसे तिहाड़ जेल में फांसी पर लटका दिया। इंदिरा गांधी के रहते किसी मुल्ले की हिम्मत नहीं थी कि मकबूल बट्ट के समर्थन में चूं भी करता, पर उनकी हत्या के बाद जब नौसिखियों के हाथ में सत्ता आई तो जेकेएलएफ ने मकबूल बट्ट की लाश मांगनी शुरू कर दी। नेशनल कांफ्रेंस के तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला जेकेएलएफ की इस मांग का समर्थन करने लगे। हर 11 फरवरी को जेकेएलएफ खुल्लमखुल्ला मकबूल बट्ट का शहादत दिवस मनाने लगा।
बूटों तले कुचले थे सैकड़ों बट्ट
5 साल के भीतर राजीव गांधी के मुस्लिम तुष्टीकरण ने कश्मीर के मुल्लावाद को इस कदर आतिशी किया कि 1989-90 में जेकेएलएफ ने कश्मीर की घाटी में हजारों हिंदुओं का नरसंहार कर दिया और लाखों कश्मीरी पंडितों को निर्वासित कर दिया। आज भी लगभग ५ लाख कश्मीरी पंडित इस देश में निर्वासित जीवन जी रहे हैं जिसकी सुध सोनिया-मनमोहन-राहुल से लेने की सोचना ही व्यर्थ अब ‘जहां हुए बलिदान मुखर्जी वह कश्मीर हमारा है’ का नारा लगाने वाली भाजपा भी लेने को तैयार नहीं। कश्मीर में 1990 के बाद लोकतंत्र तभी लौटा जब हिंदुस्तानी सुरक्षा बलों ने अपने बूटों तले सैकड़ों मकबूल बट्टों को कुचला, दर्जनों अफजल गुरुओं को दफन किया और तमाम इशरत जहां जैसी आतंकियों की ललनाओं को दोजख का रास्ता दिखलाया। 1994 में जेकेएलएफ हाथ जोड़कर बोला कि अब हम मकबूल बट्ट की शहादत का स्यापा नहीं करेंगे। तब जाकर 1997 में फिर जम्मू एवं कश्मीर में चुनाव और लोकतंत्र लौटा था। नई सहस्राब्दि का जब देश इंतजार कर रहा था ठीक उसी समय कश्मीर में पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकी उमर शेख और मौलाना अजहर मसूद को रिहा कराने के लिए इस्लामी आतंकियों ने आईसी-184 नामक इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण कर लिया। विमान कंधार ले जाया गया। यात्रियों की रिहाई के बदले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने मौलाना मसूद अजहर और उमर शेख को तालिबान के हवाले कर दिया। मौलाना अजहर मसूद पाकिस्तान गया और आईएसआई की मदद से उसने आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद खड़ा किया। इसी जैश-ए-मोहम्मद ने 13 दिसंबर 2001 को हिंदुस्तान की संसद पर हमला किया। यदि सुरक्षाबल के जवानों ने अपना बलिदान देकर आतंकियों को संसद भवन के बाहरी हिस्से में ही ढेर न किया होता तो क्या होता इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अफजल गुरु को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद भी सिर्फ वोट बैंक की राजनीति में २००५ से २०१३ तक राष्ट्रपति भवन और गृह मंत्रालय के बीच अफजल की क्षमायाचिका फाइल घूमती रही।
अब्दुल्ला के स्यापे से लौटा आतंकवाद
न्यायपालिका के शीर्षतम बिंदु सर्वोच्च न्यायालय और कार्यपालिका के सर्वोच्च शिखर राष्ट्रपति के निष्पक्ष फैसले के बाद अफजल गुरु को 9 फरवरी 2013 को तिहाड़ जेल में फांसी पर लटकाया गया। इस सजा के बाद जिस अंदाज में कश्मीरी मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्यापा किया उससे कश्मीर में आतंकवाद एक बार फिर लौट आया है। 1976 से 1984 तक पूरे 8 वर्षों तक यदि मकबूल बट्ट का मामला नहीं लटकाया गया होता तो कश्मीर में अलगाववाद शायद ही आतिशी रूप ले पाता। हजारों निर्दोष हिंदू कत्ल होने से बच जाते और लाखों कश्मीरी पंडितों को अपने केसर की क्यारी नहीं खोनी पड़ती। अफजल गुरु के मामले को ८ साल लटका कर दिल्ली हाईकोर्ट में बमकांड का आमंत्रण दिया। उमर अब्दुल्ला की हरकत अभी और कितनी लाशें गिरवाएगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा। यदि सुरक्षाबलों ने 1990 से 1996 के बीच कश्मीरी आतंकवाद को निर्ममता से कुचला नहीं होता तो अब्दुल्ला के फारुख और उमर श्रीनगर में पैर रखने की हिम्मत भी नहीं बटोर पाते। पर आज अब्दुल्ला खानदान कठमुल्ला आतंकवाद के सुर में ताल मिला रहा है। कश्मीर के आतंकवाद को कुचलने के लिए अब्दुल्ला के रिश्तेदार राजेश पायलट ने कैसे रुपए बांटे थे और कितनी इशरतों को मौत की नींद सुलवाया उस पर मानवाधिकारवादी ‘थीसिस’ लिख सकते हैं।
इशरत की अम्मा से सवाल
अब बात कर ली जाए इशरत जहां की। इशरत के नाम सेकुलर कसरत करने वाले भी इस बात से इंकार नहीं करते कि उसके साथी प्रणेश पिल्लै उर्फ जावेद गुलाम शेख, अमजद अली राणा और जीशान जौहर लश्कर-ए-तोयबा के आतंकी थे। गुजरात पुलिस की एसआईटी, मजिस्ट्रेट जांच और सीबीआई जांच सभी ने पाया कि ये तीनों आतंकी मिशन पर थे। अल-कायदा के मैन्युअल से लेकर मामूली माफिया ऑपरेशन का जानकार भी बता देगा कि आतंकी दस्ते खूबसूरत और पढ़ी-लिखी लड़कियों को अपना कवर बनाते हैं। इशरत को लश्कर-ए-तोयबा से जुड़ा हुआ न केवल डेविड कोलमेन हेडली का शिकागो कोर्ट में दिया गया बयान साबित करता है बल्कि लश्कर-ए-तोयबा के मुखपत्र गजवा टाइम्स की 2004 की रिपोर्ट भी उसको लश्कर की शहीद घोषित करता है। संभव है कि एनकाउंटर फर्जी हो।
फर्जी एनकाउंटर की कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया को न तो नरेंद्र मोदी रोक सकते हैं और न ही इंटेलिजेंस ब्यूरो के डाइरेक्टर आसिफ शेख। इस मुद्दे पर मजहबी सियासत बेतुकी है। यदि पुलिस किसी निर्दोष को मारती है तो भी बात समझ में आती। इशरत की अम्मा के पास भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं कि तीन कुख्यात आतंकियों के साथ उनकी बेटी अल्लामियां का कौन सा खैरात बांटने गई थी? यदि इशरत की फर्जी मुठभेड़ में मौत सांप्रदायिकता है तो 1980 से 1996 तक पंजाब में मारे गए हजारों संदिग्ध किन्तु कानूनन निर्दोष सिखों की मुठभेड़ में मौत को क्या कहा जाए? अकेले मुंबई में 1990 से 2006 तक हर साल औसतन 60 अभियुक्त एनकाउंटर में मारे गए जिसमें अधिकांश फर्जी थे। इन मौतों का जिम्मेदार कौन? कानून का राज होना चाहिए पर जब कानून के हाथ छोटे पड़ने लगे तो क्या निर्दोष नागरिकों की जान बचाने के लिए किए गए हर ऑपरेशन की पोस्टमार्टम संभव है? फिर सिर्पâ एक गुजरात को सांप्रदायिक करार देने के लिए आतंक का पुष्टीकरण क्यों?
अब राज्य सरकारें आईबी की खुफिया जानकारियों पर एक्शन लेने से कतराने लगी हैं। कल गया के बौद्ध मंदिर में हुए विस्फोट की वारदात इसका ताजा उदाहरण है। वर्ना क्या कारण हो सकता है कि इस कांड से पहले ही लश्कर-ए-तोयबा द्वारा वहां रेकी करने की खुफिया रिपोर्ट होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई? इस कांड से एक बात शीशे की तरह साफ हो गई है कि इशरत जहां जैसों पर स्यापा करनेवालों ने पूरे सुरक्षा तंत्र को पंगु बना दिया है। यही कारण है कि अब इन्फॉरमेशन देनेवाला इन्फॉरमेशन देने से कतरा रहा है तो एक्शन लेनेवाला एक्शन लेने से।

http://visfot.com/index.php/current-affairs/9592-muslim-terrorism-in-india-and-secular-1307.html

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