Friday, July 5, 2013

आतंकवाद पर आत्मघाती रवैया

आतंकवाद पर आत्मघाती रवैया

जब इशरत जहां पुलिस गोलीकांड मामले में आरोपपत्र दाखिल होने के पूर्व से ही तूफान खड़ा किया जा रहा था तो फिर आरोपपत्र आने के बाद उसे बवंडर में परिणत करने की कोशिश बिल्कुल स्वाभाविक है। हालांकि जिस तरह खुफिया ब्यूरो के अधिकारी से लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमित शाह आदि के नाम आने से लेकर उनके भविष्य तक का आकलन पहले ही कर दिया गया था वैसा कुछ हुआ नहीं। हां, कुछ लोगों के लिए संतोष का विषय यह है कि आरोपपत्र में सीबीआइ ने जांच जारी रखने की बात कही है। दुर्भाग्य से इस आरोपपत्र की गलत व्याख्या भी की जा रही है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो सीबीआइ ने अपनी जांच में इशरत जहां सहित मारे गए चारों को बिल्कुल निर्दोष साबित कर दिया है। इशरत जहां मामले के दो पहलू हैं। एक यह कि वह और उसके साथियों ने वाकई पुलिस के साथ भिड़ंत की या उन्हें पकड़ने के बाद मारा गया? दो, क्या वे चारों निर्दोष थे या आतंकवाद या अपराध से उनका रिश्ता था? आरोपपत्र में केवल यह कहा गया है कि 15 जून 2004 को अहमदाबाद के नरोदा इलाके में मारी गई इशरत एवं उनके तीन साथियों ने पुलिस से मुठभेड़ नहीं की थी, वे पहले से पुलिस के कब्जे में थे, जिन्हें मारकर मुठभेड़ की झूठी कथा में परिणत कर दिया गया। नि:संदेह इस मामले में पहले आई रिपोटरें से भी पुलिस की भूमिका संदेह के घेरे में आती हैं। मसलन, 9 सितंबर 2009 को मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट न्यायमूर्ति एसपी तमांग की जांच रिपोर्ट। इसमें भी उनके पास हथियार रखने की बात थी। इसमें कहा गया था कि उप महानिरीक्षक डीजी बंजारा एवं पुलिस आयुक्त केआर कौशिक ने इशरत जहां, जावेद गुलाम शेख उर्फ प्राणेश पिल्लई, अमजद अली उर्फ राजकुमार राणा और जीशान अली को महाराष्ट्र में ठाणे व अन्य जगहों से उठाया और 14 जून की रात्रि में 10-12 बजे के बीच गोली मार दी, लेकिन तमांग की रिपोर्ट व्यापक जांच के बजाय पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मृत्यु के कारण संबंधी रिपोर्ट, फोरेंसिक निष्कर्ष एवं सबडिविजनल मजिस्ट्रेट की प्राथमिक छानबीन पर आधारित थी।

सीबीआइ आरोपपत्र से उनके आतंकवादी न होने का प्रमाण नहीं मिलता। सीबीआइ आरोपपत्र के अनुसार उसने इस पहलू की जांच की ही नहीं। क्यों नहीं की? तो जवाब है कि उच्च न्यायालय ने ऐसा करने को नहीं कहा। खैर, पुलिस ने दावा किया था कि वे चारों मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या के इरादे से आए थे और लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी थे। इसके भी दो पहलू हैं। एक यह कि उनके आतंकवादी होने की सूचना कहां से आई थी? यह साफ है कि केंद्रीय खुफिया ब्यूरो ने पहले इसकी छानबीन की, फिर गुजरात एवं यहां तक कि महाराष्ट्र पुलिस को भी इसकी जानकारी दी। यानी यह गुजरात पुलिस की अपनी सूचना पर कार्रवाई नहीं थी। सीबीआइ कह रही है कि खुफिया ब्यूरो ने पहले अमजद अली उर्फ राजकुमार राणा और जीशान अली को गिरफ्तार किया, फिर इशरत और उसके साथी जावेद गुलाम शेख उर्फ प्राणेश पिल्लई को गिरफ्तार किया गया था। इन चारों को आइबी ने दो तीन हफ्ते तक अपनी हिरासत में रखा, फिर गुजरात पुलिस को सौंप दिया।

प्रश्न है कि अगर खुफिया ब्यूरो कोई सूचना देता है तो जिम्मेदारी उसकी होगी या राच्य की? अगर राच्य की पुलिस को केंद्रीय खुफिया ब्यूरो के तत्कालीन संयुक्त निदेशक राजेंद्र कुमार ने सूचना दी तो जिम्मेदारी उनकी है और वे अकेले तो इस ऑपरेशन में संलग्न थे नहीं। इसमें वहां के मुख्यमंत्री कैसे षड्यंत्र में शामिल हो सकते हैं। अब आएं उनके आतंकवादी होने और न होने के आरोप पर। आइबी द्वारा सीबीआइ को लिखे पत्र के अनुसार सितंबर 2009 में अमेरिका में पकड़े गए पाकिस्तान मूल के लश्कर-ए-तैयबा आतंकी डेविड कोलमैन हेडली ने एफबीआइ के सामने अपने कुबूलनामे में लिखा है कि इशरत जहां और उसके साथी लश्कर से जुड़े थे और वह स्वयं एक फिदायीन थी। जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनके अनुसार केंद्रीय खुफिया ब्यूरो के अधिकारी पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी मुजम्मिल का फोन ट्रेस कर रहे थे। इस दौरान सुराग मिला कि जीशान जौहर नामक आतंकवादी 26 अप्रैल 2004 को अहमदाबाद आया है एवं छद्म पहचान के साथ गोता हाउसिंग बोर्ड में रुका है। इसी दौरान दूसरी सूचना 27 मई को अमजद अली राणा के कालूपुल-अहमदाबाद रेलवे स्टेशन के सामने स्थित होटल में ठहरने की जानकारी मिली।

सीबीआइ का कहना है कि पुलिस ने राणा को उठा लिया। तत्पश्चात चारों को 15 जून 2004 को पूर्वी अहमदाबाद में मार गिराया गया। यह मान लिया जाए कि उन्हें उठाकर मारा गया तब भी उनके आतंकवादी होने का संदेह पुख्ता अवश्य होता है। अमेरिका गए राष्ट्रीय जांच एजेंसी एवं कानून मंत्रालय के चार सदस्यीय दल ने वहां क्या जानकारी प्राप्त की उसे देश के सामने लाया जाए। 6 अगस्त 2009 को अपने पहले हलफनामे में गृह मंत्रालय ने इशरत और उसके साथियों को लश्कर आतंकी बताते हुए मुठभेड़ की सीबीआइ जांच का विरोध किया था। दो महीने के भीतर ही हलफनामा बदल दिया गया था। क्यों? जाहिर है, फर्जी मुठभेड़ के आरोप की आड़ में हमें उतावलेपन और केवल मोदी विरोध की भावना में आतंकवादी या संदेहास्पद गतिविधियों वाले पहलू को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। फर्जी मुठभेड़ बिल्कुल अनुचित है, परंतु यह देश की सुरक्षा का मामला है। आतंकवादी रडार में शीर्ष पर होने वाले देश के लिए ऐसा रवैया आत्मघाती होगा। अगर हम आतंकवादियों की खुफिया जानकारी और परवर्ती कार्रवाई में लगी आइबी, पुलिस या सरकारों को ही कठघरे में खड़ा करेंगे तो इससे आतंकवादियों और देश विरोधियों का ही हौसला बढ़ेगा।

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