Friday, January 17, 2014

आम चुनाव 2014 का अमेरिकी मोहरा?

आम चुनाव 2014 का अमेरिकी मोहरा?

नई दिल्ली |  नरेन्द्र मोदी का उभार देश में तेजी से हुआ है। अमेरिका इस बात को समझ रहा है। मोदी से अमेरिका के संबंध ठीक नहीं हैं। वे चीन के करीबी हैं। तो क्या अमेरिका विकल्प खोज रहा है?
मोदी की चीन से नजदीकी की अमेरिका को अखर रही थी। दूसरी तरफ मनमोहन के बाद उसे कोई दिख नहीं रहा था। यहीं पर केजरीवाल की जरूरत अमेरिका को उसी तरह समझ में आती है, जैसे पाकिस्तान में इमरान खान की।
अमेरिका की एशिया नीति को विकिलीक्स ने सभी के सामने 2009 में ही रख दिया था। विकिलीक्स ने अमेरिका के जिस गोपनीय दस्तावेज को जारी किया था, उसके मुताबिक भारत अमेरिका की एशिया नीति के केन्द्र में है।
उसी के आइने में हमें भारतीय सियासत और उसमें अमेरिकी दखल को समझना चाहिए। इस एशिया नीति में अमेरिका ‘न्यू नाटो’ का जिक्र करता है। इसमें भारत में नीतिकारों और वातावरण बनाने वाले समूहों से संपर्क करने की बात कही गई है।
इसमें अधिकारियों, सांसदों, पत्रकारों और अन्य बुद्धिजीवियों को यूरोप के देशों में सैर कराने की बात कही गई है। इस दौरान ‘नाटो’ के देशों और अमेरिका में लाकर उन्हें ‘न्यू नाटों’ के बारे में समझाना चाहिए। इसमें भारत के संदर्भ में अमेरिका ने अपने लक्ष्य को भी समझाया है, लेकिन अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उसे भारत में अपने अनुकूल नेतृत्व की जरूरत होगी।
इसके लिए अमेरिका को मनमोहन सिंह से आगे सोचना पड़ेगा। 2014 उसके लिए अनुकूल नहीं दिख रहा है, क्योंकि भारत में नरेन्द्र मोदी का उभार अमेरिका को साफ दिख रहा था। नरेन्द्र मोदी से अमेरिका के संबंध ठीक नहीं हैं। 2002 के दंगो के बाद मार्च 2005 में अमेरिका ने नरेन्द्र मोदी को वीजा नहीं दिया। यही नहीं, मोदी का टूरिस्ट वीजा भी निरस्त कर दिया।
यहीं नरेन्द्र मोदी भावी भारतीय विदेश नीति का एजेंडा तय करते दिखते हैं। यह मोदी का स्वाभिमानी एंजेडा है। अमेरिका के नरेन्द्र मोदी को वीजा न देने पर बी. रमन ने 21 मार्च, 2005 को रेडिफ डॉट कॉम पर लिखते हैं। इसमें वह अमेरिकी फैसले पर सवाल खड़ा करते हैं और अमेरिकी नीति को भी समझाते हैं।
बहरहाल, अमेरिकी वीजा न मिलने के करीब एक साल बाद नवंबर 2006 में नरेन्द्र मोदी चीन का रुख करते हैं। चीन में उनका जोरदार स्वागत होता है। इसके बाद नरेन्द्र मोदी लगातार तीन और यात्राएं चीन की करते हैं। 2007 में चीन ने दालियान शहर में होने वाले समर डावोस सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए मोदी को आंमंत्रित किया।
नवंबर 2011 में एक बार फिर नरेन्द्र मोदी चीन का रुख करते हैं। इस दौरे से चीन पर नरेन्द्र मोदी के प्रभाव को समझा जा सकता है। इस दौरे में 2010 से जो भारतीय हीरा व्यापारी चीन में बंद था, उन्हें छुड़ाकर मोदी अपने साथ भारत ले आए।
मोदी की चीन से नजदीकी अमेरिका को अखर रही थी। दूसरी तरफ मनमोहन के बाद उसे कोई दिख नहीं रहा था। यहीं पर अरविंद केजरीवाल की जरूरत अमेरिका को उसी तरह समझ में आती है, जैसे पाकिस्तान में इमरान खान की।

केजरीवाल के 'परिवर्तन' का फोर्ड से रिश्ता
नई दिल्ली |  अब अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। पहले ‘परिवर्तन’ नामक संस्था के प्रमुख थे। उनका यह सफर रोचक है। उनकी संस्थाओं के पीछे खड़ी विदेशी शक्तियों को लेकर भी कई सवाल हवा में तैर रहे हैं।
एक ‘बियॉन्ड हेडलाइन्स’ नामक वेबसाइट ने ‘सूचना के अधिकार कानून’ के जरिए ‘कबीर’ को विदेशी धन मिलने की जानकारी मांगी। इस जानकारी के अनुसार ‘कबीर’ को 2007 से लेकर 2010 तक फोर्ड फाउंडेशन से 86,61,742 रुपए मिले हैं। कबीर को धन देने वालों की सूची में एक ऐसा भी नाम है, जिसे पढ़कर हर कोई चौंक जाएगा। यह नाम डच दूतावास का है।
पहला सवाल तो यही है कि फोर्ड फाउंडेशन और अरविंद केजरीवाल के बीच क्या संबंध हैं? दूसरा सवाल है कि क्या हिवोस भी उनकी संस्थाओं को मदद देता है? तीसरा सवाल, क्या डच दूतावास के संपर्क में अरविंद केजरीवाल या फिर मनीष सिसोदिया रहते हैं?
इन सवालों का जवाब केजरीवाल को इसलिए भी देना चाहिए, क्योंकि इन सभी संस्थाओं से एक चर्चित अंतरराष्ट्रीय खुफिया एजेंसी के संबंध होने की बात अब सामने आ चुकी है। वहीं अरविंद केजरीवाल एक जनप्रतिनिधि हैं।
पहले बाद करते हैं फोर्ड फाउंडेशन और अरविंद केजरीवाल के संबंधों पर। जनवरी 2000 में अरविंद छुट्टी पर गए। फिर ‘परिवर्तन’ नाम से एक गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) का गठन किया। केजरीवाल ने साल 2006 के फरवरी महीने से ‘परिवर्तन’ में पूरा समय देने के लिए सरकारी नौकरी छोड़ दी। इसी साल उन्हें उभरते नेतृत्व के लिए मैगसेसे का पुरस्कार मिला।
यह पुरस्कार फोर्ड फाउंडेशन की मदद से ही सन् 2000 में शुरू किया गया था। केजरीवाल के प्रत्येक कदम में फोर्ड फाउंडेशन की भूमिका रही है। पहले उन्हें 38 साल की उम्र में 50,000 डॉलर का यह पुरस्कार मिला, लेकिन उनकी एक भी उपलब्धि का विवरण इस पुरस्कार के साथ नहीं था। हां, इतना जरूर कहा गया कि वे परिवर्तन के बैनर तले केजरीवाल और उनकी टीम ने बिजली बिलों संबंधी 2,500 शिकायतों का निपटारा किया।
विभिन्न श्रेणियों में मैगसेसे पुरस्कार रोकफेलर ब्रदर्स फाउंडेशन ने स्थापित किया था। इस पुरस्कार के साथ मिलने वाली नगद राशि का बड़ा हिस्सा फोर्ड फाउंडेशन ही देता है। आश्चर्यजनक रूप से केजरीवाल जब सरकारी सेवा में थे, तब भी फोर्ड उनकी संस्था को आर्थिक मदद पहुंचा रहा था। केजरीवाल ने मनीष सिसोदिया के साथ मिलकर 1999 में ‘कबीर’ नामक एक संस्था का गठन किया था। हैरानी की बात है कि जिस फोर्ड फाउंडेशन ने आर्थिक दान दिया, वही संस्था उसे सम्मानित भी कर रही थी। ऐसा लगता है कि यह सब एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा थी।
फोर्ड ने अपने इस कदम से भारत के जनमानस में अपना एक आदमी गढ़ दिया। केजरीवाल फोर्ड फाउंडेशन द्वारा निर्मित एक महत्वपूर्ण आदमी बन गए। हैरानी की बात यह भी है कि ‘कबीर’ पारदर्शी होने का दावा करती है, लेकिन इस संस्था ने साल 2008-9 में मिलने वाले विदेशी धन का व्योरा अपनी वेबसाइट पर नहीं दिया है, जबकि फोर्ड फाउंडेशन से मिली जानकारी बताती है कि उन्होंने ‘कबीर’को 2008 में 1.97 लाख डॉलर दिए। इससे साफ होता है कि फोर्ड फाउंडेशन ने 2005 में अपना एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए अरविंद केजरीवाल को चुना। उसकी सारी गतिविधियों का खर्च वहन किया। इतना ही नहीं, बल्कि मैगससे पुरस्कार दिलवाकर चर्चा में भी लाया।
एक ‘बियॉन्ड हेडलाइन्स’ नामक वेबसाइट ने ‘सूचना के अधिकार कानून’ के जरिए ‘कबीर’ को विदेशी धन मिलने की जानकारी मांगी। इस जानकारी के अनुसार ‘कबीर’ को 2007 से लेकर 2010 तक फोर्ड फाउंडेशन से 86,61,742 रुपए मिले हैं। कबीर को धन देने वालों की सूची में एक ऐसा भी नाम है, जिसे पढ़कर हर कोई चौंक जाएगा। यह नाम डच दूतावास का है।
यहां सवाल उठता है कि आखिर डच दूतावास से अरविंद केजरीवाल का क्या संबंध है? क्योंकि डच दूतावास हमेशा ही भारत में संदेह के घेरे में रहा है। 16 अक्टूबर, 2012 को अदालत ने तहलका मामले में आरोप तय किए हैं। इस पूरे मामले में जिस लेख को आधार बनाया गया है, उसमें डच की भारत में गतिविधियों को संदिग्ध बताया गया है।
इसके अलावा सवाल यह भी उठता है कि किसी देश का दूतावास किसी दूसरे देश की अनाम संस्था को सीधे धन कैसे दे सकता है? आखिर डच दूतावास का अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया से क्या रिश्ता है? यह रहस्य है। न तो स्वयं अरविंद और न ही टीम अरविंद ने इस बाबत कोई जानकारी दी है।
इतना ही नहीं, बल्कि 1985 में पीएसओ नाम की एक संस्था बनाई गई थी। इस संस्था का काम विकास में सहयोग के नाम पर विशेषज्ञों को दूसरे देशों में तैनात करना था। पीएसओ को डच विदेश मंत्रालय सीधे धन देता है। पीएसओ हिओस समेत 60 डच विकास संगठनों का समूह है। नीदरलैंड सरकार इसे हर साल 27 मिलियन यूरो देती है। पीएसओ ‘प्रिया’ संस्था का आर्थिक सहयोगी है। प्रिया का संबंध फोर्ड फाउंडेशन से है। यही ‘प्रिया’ केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की संस्था ‘कबीर’ की सहयोगी है।
इन सब बातों से साफ है कि डच एनजीओ, फोर्ड फाउंडेशन,डच सरकार और केजरीवाल के बीच परस्पर संबंध है। इतना ही नहीं, कई देशों से शिकायत मिलने के बाद पीएसओ को बंद किया जा रहा है। ये शिकायतें दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से संबंधित हैं। 2011 में पीएसओ की आम सभा ने इसे 1 जनवरी, 2013 को बंद करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय दूसरे देशों की उन्हीं शिकायतों का असर माना जा रहा है।
हाल ही में पायनियर नामक अंग्रेजी दैनिक अखबार ने कहा कि हिवोस ने गुजरात के विभिन्न गैर सरकारी संगठन को अप्रैल 2008 और अगस्त 2012 के बीच 13 लाख यूरो यानी सवा नौ करोड़ रुपए दिए। हिवोस पर फोर्ड फाउंडेशन की सबसे ज्यादा कृपा रहती है। डच एनजीओ हिवोस इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस द हेग (एरासमस युनिवर्सिटी रोटरडम) से पिछले पांच सालों से सहयोग ले रही है। हिवोस ने “परिवर्तन” को भी धन मुहैया कराया है।
इस संस्था की खासियत यह है कि विभिन्न देशों में सत्ता के खिलाफ जनउभार पैदा करने की इसे विशेषज्ञता हासिल है। डच सरकार के इस पूरे कार्यक्रम का समन्वय आईएसएस के डॉ.क्रीस बिकार्ट के हवाले है। इसके साथ-साथ मीडिया को साधने के लिए एक संस्था खड़ी की गई है। इस संस्था के दक्षिणी एशिया में सात कार्यालय हैं। जहां से इनकी गतिविधियां संचालित होती हैं। इस संस्था का नाम ‘पनोस’ है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जो हो रहा है वह प्रायोजित है?

शिमिरित, कबीर और केजरीवाल !
नई दिल्ली |  यह शिमिरित ली कौन है, शोधार्थी या अमेरिकी एजेंट? दस्तावेज बताते हैं कि वह बतौर शोधार्थी ‘कबीर’ संस्था से जुड़े थी। इस संस्था के गॉड-फादर अरविंद केजरीवाल रहे हैं।
शिमरित ली को लेकर अटकलें लग रही हैं, क्योंकि शिमरित ली कबीर संस्था में रहकर न केवल भारत में आंदोलन का तानाबाना बुन रही थी, बल्कि लंदन से लेकर काहिरा और चाड से लेकर फिलिस्तीन तक संदिग्ध गतिविधियों में संलिप्त थी।
शिमिरित ली दुनिया के अलग-अलग देशों में विभिन्न विषयों पर काम करती रही है। भारत आकर उसने नया काम किया। कबीर संस्था से जुड़ी। प्रजातंत्र के बारे में उसने एक बड़ी रिपोर्ट महज तीन-चार महीनों में तैयार की। फिर वापस चली गई। आखिर दिल्ली आने का उसका मकसद क्या था? इसे एक दस्तावेजी कहानी और अरविंद केजरीवाल के संदर्भ में समझा जा सकता है।
बहरहाल कहानी कुछ इस प्रकार है। जिस स्वराज के राग को केजरीवाल बार-बार छेड़ रहे हैं, वह आखिर क्या है? साथ ही सवाल यह भी उठता है कि अगर इस गीत के बोल ही केजरीवाल के हैं तो गीतकार और संगीतकार कौन है? यही नहीं, इसके पीछे का मकसद क्या है? इन सब सवालों के जवाब ढूंढ़ने के लिए हमें अमेरिका के न्यूयार्क शहर का रुख करना पड़ेगा।
न्यूयार्क विश्वविद्यालय दुनिया भर में अपने शोध के लिए जाना जाता है। इस विश्वविद्यालय में ‘मध्यपूर्व एवं इस्लामिक अध्ययन’ विषय पर एक शोध हो रहा है। शोधार्थी का नाम है, शिमिरित ली। शिमिरित ली दुनिया के कई देशों में सक्रिय है। खासकर उन अरब देशों में जहां जनआंदोलन हुए हैं। वह चार महीने के लिए भारत भी आई थी। भारत आने के बाद वह शोध करने के नाम पर ‘कबीर’ संस्था से जुड़ गई।
सवाल है कि क्या वह ‘कबीर’ संस्था से जुड़ने के लिए ही शिमिरित ली भारत आई थी? अभी यह रहस्य है। उसने चार महीने में एक रिपोर्ट तैयार की। यह भी अभी रहस्य है कि शिमरित ली की यह रिपोर्ट खुद उसने तैयार की या फिर अमेरिका में तैयार की गई थी
बहरहाल, उस रिपोर्ट पर गौर करें तो उसमें भारत के लोकतंत्र की खामियों को उजागर किया गया है। रिपोर्ट का नाम है ‘पब्लिक पावर-इंडिया एंड अदर डेमोक्रेसी’। इसमें अमेरिका, स्विट्जरलैंड और ब्राजील का हवाला देते हुए ‘सेल्फ रूल’ की वकालत की गई है। अरविंद केजरीवाल की ‘मोहल्ला सभा’ भी इसी रिपोर्ट का एक सुझाव है। इसी रिपोर्ट के ‘सेल्फ रूल’ से ही प्रभावित है, अरविंद केजरीवाल का ‘स्वराज’। अरविंद केजरीवाल भी अपने स्वराज में जिन देशों की व्यवस्था की चर्चा करते हैं, उन्हीं तीनों अमेरिका, ब्राजील और स्विट्जरलैंड का ही जिक्र शिमिरित भी अपनी रिपोर्ट में करती हैं।
‘कबीर’ के कर्ताधर्ता अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया हैं। यहां शिमरित के भारत आने के समय पर भी गौर करने की जरूरत है। वह मई 2010 में भारत आई और कबीर से जुड़ी। वह अगस्त 2010 तक भारत में रही। इस दौरान ‘कबीर’ की जवाबदेही, पारदर्शिता और सहभागिता पर कार्यशालाओं का जिम्मा भी शिमरित ने ही ले लिया था। इन चार महीनों में ही शिमरित ली ने ‘कबीर’ और उनके लोगों के लिए आगे का एजेंडा तय कर दिया। उसके भारत आने का समय महत्वपूर्ण है।
इसे समझने से पहले संदिग्ध शिमरित ली को समझने की जरूरत है, क्योंकि शिमरित ली कबीर संस्था में रहकर न केवल भारत में आंदोलन का तानाबाना बुन रही थी, बल्कि लंदन से लेकर काहिरा और चाड से लेकर फिलिस्तीन तक संदिग्ध गतिविधियों में संलिप्त थी।
यहूदी परिवार से ताल्लुक रखने वाली शिमिरित ली को 2007 में कविता और लेखन के लिए यंग आर्ट पुरस्कार मिला। उसे यह पुरस्कार अमेरिकी सरकार के सहयोग से चलने वाली संस्था ने नवाजा। यहीं वह सबसे पहले अमेरिकी अधिकारियों के संपर्क में आई। जब उसे पुरस्कार मिला तब वह जेक्शन स्कूल फॉर एडवांस स्टडीज में पढ़ रही थी। यहीं से वह दुनिया के कई देशों में सक्रिय हुई।
जून 2008 में वह घाना में अमेरिकन ज्यूश वर्ल्ड सर्विस में काम करने पहुंचती। नवंबर 2008 में वह ह्यूमन राइट वॉच के अफ्रीकी शाखा में बतौर प्रशिक्षु शामिल हुई। वहां उसने एक साल बिताए। इस दौरान उसने चाड के शरणार्थी शिविरों में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा संबंधी दस्तावेजों की समीक्षा और विश्लेषण का काम किया। जिन-जिन देशों में शिमिरित की सक्रियता दिखती है, वह संदेह के घेरे में है। हर एक देश में वह पांच महीने के करीब ही रहती है। उसके काम करने के विषय भी अलग-अलग होते हैं। उसके विषय और काम करने के तरीके से साफ जाहिर होता है कि उसकी डोर अमेरिकी अधिकारियों से जुड़ी है।
दिसंबर 2009 में वह ईरान में सक्रिय हुई। 7 दिसंबर, 2009 को ईरान में छात्र दिवस के मौके पर एक कार्यक्रम में वह शिरकत करती है। वहां उसकी मौजूदगी भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि इस कार्यक्रम में ईरान में प्रजातंत्र समर्थक अहमद बतेबी और हामिद दबाशी शामिल थे।
ईरान के बाद उसका अगल ठिकाना भारत था। यहां वह ‘कबीर’ से जुड़ी। चार महीने में ही उसने भारतीय लोकतंत्र पर एक रिपोर्ट संस्था के कर्ताधर्ता अरविंद केजरावाल और मनीष सिसोदिया को दी। अगस्त में फिर वह न्यूयार्क वापस चली गई। उसका अगला पड़ाव होता है ‘कायन महिला संगठन’। यहां वह फरवरी 2011 में पहुंचती। शिमिरित ने वहां “अरब में महिलाएं” विषय पर अध्ययन किया। कायन महिला संगठन में उसने वेबसाइट, ब्लॉग और सोशल नेटवर्किंग का प्रबंधन संभाला। यहां वह सात महीने रही। अगस्त 2011 तक। अभी वह न्यूयार्क विश्वविद्यालय में शोध के साथ ही ‘अर्जेंट एक्शन फंड’ से बतौर सलाहकार जुड़ी हैं।
पूरी दुनिया में जो सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और स्त्री संबंधी मुद्दों पर जो प्रस्ताव आते हैं, उनकी समीक्षा और मूल्यांकन का काम शिमिरित के जिम्मे है। अगस्त 2011 से लेकर फरवरी 2013 के बीच शिमिरित दुनिया के कई ऐसे देशों में सक्रिय थी, जहां उसकी सक्रियता पर सवाल उठते हैं। इसमें अरब देश शामिल हैं। मिस्र में भी शिमिरित की मौजूदगी चौंकाने वाली है। यही वह समय है, जब अरब देशों में आंदोलन खड़ा हो रहा था।
शिमिरित ली 17वें अरब फिल्म महोत्सव में भी सक्रिय रहीं। इसका प्रीमियर स्क्रीनिंग सेन फ्रांसिस्को में हुआ। स्क्रीनिंग के समय शिमिरित ने लोगों को संबोधित भी किया। इस फिल्म महोत्सव में उन फिल्मों को प्रमुखता दी गई, जो हाल ही में जन आंदोलनों के ऊपर बनी थी।  
शिमिरित आई तो फंडिंग बढ़ी
शिमिरित ली के कबीर संस्था से जुड़ने के समय को उसके विदेशी वित्तीय सहयोग के नजरिए से भी देखने की जरूरत है। एक वेबसाइट ने ‘सूचना के अधिकार’ के तहत एक जानकारी मांगी। उस जानकारी के मुताबिक कबीर को 2007 से लेकर 2010 तक फोर्ड फाउंडेशन से 86,61,742 रुपए मिले। 2007 से लेकर 2010 तक फोर्ड ने कबीर की आर्थिक सहायता की।
इसके बाद 2010 में अमेरिका से शिमिरित ली ‘कबीर’ में काम करने के लिए आती हैं। चार महीने में ही वह भारतीय प्रजातंत्र का अध्ययन कर उसे खोखला बताने वाली रिपोर्ट केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को देकर चली जाती है। शिमिरित ली के जाने के बाद ‘कबीर’ को फिर फोर्ड फाउंडेशन से दो लाख अमेरिकी डॉलर का अनुदान मिला। इसे भारत की खुफिया एंजेसी ‘रॉ’ के अपर सचिव रहे बी. रमन की इन बातों से समझा जा सकता है।
एक बार बी. रमन ने एनजीओ और उसकी फंडिंग पर आधारित एक किताब के विमोचन के समय कहा था कि “सीआईए सूचनाओं का खेल खेलती है। इसके लिए उसने ‘वॉयस ऑफ अमेरिका’ और ‘रेडियो फ्री यूरोप’ को बतौर हथियार इस्तेमाल करती है।” अपने भाषण में बी. रमन ने इस बात की भी चर्चा की कि विदेशी खुफिया एजेंसियां कैसे एनजीओ के जरिए अपने काम को अंजाम देती हैं। किसी भी देश में अपने अनुकूल वातावरण तैयार करने के लिए सीआईए उस देश में पहले से काम कर रही एनजीओ का इस्तेमाल करना ज्यादा सुलभ समझती है। उसे अपने रास्ते पर लाने के लिए वह फंडिंग का सहारा लेती है। जिस क्षेत्र में एनजीओ नहीं है, वहां एनजीओ बनवाया जाता है। 


आगे केजरीवाल, पीछे ‘सीआईए’ ‘फोर्ड’
नई दि्ल्ली |  अरविंद केजरीवाल ने ‘आम आदमी पार्टी’ (आप) बनाकर जो आदर्श रखा है। उस पर वे कितना खरे उतरते हैं? इसे समझना भी जरूरी है। अन्यथा जनता एक बार फिर धोखा खा सकती है।
फोर्ड उंडेशन की वेबसाइट के मुताबिक 2011 में केजरीवाल व मनीष की ‘कबीर’ नामक संस्था को करीब दो लाख अमेरिकी डॉलर का अनुदान मिला था। फॉरेन कॉन्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट-2010 के मुताबिक विदेशी धन पाने के लिए भारत सरकार की अनुमति लेना और राशी खर्च करने के लिए निर्धारित मानकों का पालन करना जरूरी होता है, लेकिन टीम केजरीवाल के सदस्यों ने नियमों का पालन नहीं किया
अरविंद केजरीवाल की शुरुआत ऐसे रास्तों से हो रही है, जिससे एक जमाने में मर्यादित राजनैतिक दल अपने शुरुआती समय में बचत थे। ‘इंडिया अंगेस्ट करप्शन’ अभियान से आंदोलन बनता, इसे पहले ही राजनैतिक महत्वाकांक्षा ने उससे बिखेर दिया। अन्ना और अरविंद में मतभेद वैचारिक नहीं, बल्कि इस मतभेद का आधार अविश्वास और राजनैतिक महत्वकांक्षा रही।
जब तक अरविंद केजरावाल को लगा कि अन्ना को अपने अनुसार चला सकते हैं, तबतक उनके पीछे रहे। लेकिन जैसे ही अन्ना हजारे ने पैसे और पारदर्शिता का सवाल उठाया, तब से मतभेद शुरू हुए। अब अरविंद केजरीवाल संसदीय राजनीति के रास्ते पर निकल चुके हैं। उन वादों के साथ, जो कभी आजादी के बाद सत्ता में आने वाले नेताओं ने किए और बाद में जेपी आंदोलन से निकले हुए राजनेताओं ने किए। अब उन्हीं नेताओं के खिलाफ उन्हीं की ही तरह के वादों के साथ केजरीवाल आए हैं। फैसला देश की जनता को करना है। वह इतिहास दोहराती है या फिर नया लिखती है।
अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की आखिरी साझा बैठक 19 सितंबर, 2012 को दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हुई थी। बैठक के बाद बाहर आते ही अन्ना ने मीडिया से चौंकाने वाली बात कही थी कि राजनीति में कोई उनके नाम या चित्र का उपयोग नहीं करेगा। दिल्ली चुनाव में हम इसकी हकीकत देख चुके हैं। 
वहीं बैठक में मौजूद लोगों के मुताबिक अन्ना ने केजरीवाल से एक सूत्र सवाल किया था। वह था कि आपके संगठन के लिए धन कहां से आएगा? इस सवाल पर केजरीवाल ने कहा कि जैसे औरों को आता है। इस जवाब में कई रहस्य छुपा था। दूसरे लोग इसे समझ रहे थे। यही वजह थी कि अन्ना ने तत्काल स्वयं को इससे अलग कर लिया। तो क्या दूसरे दलों की तरफ आम आदमी पार्टी भी चुनाव के लिए रुपए का इंतजाम कर रही थी? इसका जवाब आना है। हालांकि, अरविंद केजरीवाल कुछ और दावा कर रहे हैं।
यह भी समझना जरूरी है कि अन्ना ने अरविंद केजरीवाल से यह सवाल क्यों पूछा था? केजरीवाल के गैर सरकारी संगठन पर धन के स्रोतों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इस बाबत एक जनहित याचिका भी दिल्ली हाईकोर्ट में दायर हो चुकी है। खैर, यहां केजरीवाल और उनके संगठनों की पड़ताल से पहले कुछ तथ्यों को समझना उचित रहेगा है।
फोर्ड फाउंडेशन से रिश्ता
अमेरिकी खुफिया एंजेसी सीआईए और फोर्ड फाउंडेशन के दस्तावेजों पर आधारित एक किताब 1999 में आई थी। किताब का नाम है ‘हू पेड द पाइपर? सीआईए एंड द कल्चरल कोल्ड वार’। फ्रांसेस स्टोनर सांडर्स ने अपनी इस किताब में दुनियाभर में सीआईए के काम करने के तरीके को समझाया है। दस्तावेजों के आधार पर लेखक सान्डर्स ने सीआईए और कई नामचीन संगठनों के संबंधों को उजागर किया है। किताब के मुताबिक फोर्ड फाउंडेशन और अमेरिका के मित्र देशों के कई संगठनों के जरिए सीआईए दूसरे देशों में अपने लोगों को धन मुहैया करवाता है।
इतना ही नहीं, बल्कि अमेरिकी कांग्रेस ने 1976 में एक कमेटी बनाई थी। इस कमेटी की तहकीकात में जो जानकारी सामने आई, वह और चौंकाने वाली थी। जांच में पाया गया कि उस समय अमेरिका ने विविध संगठनों को 700 बार दान दिए, इनमें से आधे से अधिक सीआईए के जरिए खर्च किए गए।
यह पहली किताब नहीं है, जिसने इन तथ्यों को सामने रखा है। इसके पहले भी इस तरह की खुफिया एजेंसिओं के देश विरोधी गतिविधियों का पर्दाफाश होता रहा है। पहले के सोवियत संघ की खुफिया एजेंसी केजीबी अब नही हैं। लेकिन केजीबी के कारनामे अब सबके सामने हैं। दस्तावेजों के आधार पर केजीबी पर किताब आ चुकी है। किताब कई खंडों में है। इसका नाम ‘द मित्रोखिन आर्काइव-द केजीबी एंड द वर्ल्ड’ है। इस किताब के दूसरे खंड के 17वें और 18वें अध्याय में भारत में केजीबी की गतिविधियों के बारे नें बताया गया है। पैसे के बल पर केजीबी ने भारत में अपने अनुकूल महौल समय-समय पर बनाता रहा। इसमें फोर्ड का भी जिक्र आया है। केजीबी से पैसा लेने वाले नाम बडे है। केजीबी की विदेशी गतिविधियों से संबंधित अभिलेख जिसके जिम्मे था, वही वासिली मित्रोखिन इस किताब के लेखक हैं।
केजीबी अब नही है, लेकिन सीआईए अब भी है। इसकी सक्रियता अपने चरम पर है। सीआईए की गतिविधि का एक सिरा केजरीवाल और उनके संगठनों पर विचाराधीन एक जनहित याचिका से जुड़ा है। दिल्ली हाईकोर्ट में इस याचिका के स्वीकार होने के बाद गृह मंत्रालय ने एफसीआरए के उल्लंघन के संदेह पर ‘कबीर’ नाम की गैर सरकारी संगठन के कार्यालय में छापे मारे। यह संस्था टीम अरविंद के प्रमुख सदस्य मनीष सिसोदिया के देख-रेख में चलती है। और यह अरविंद के दिशा निर्देश पर काम करती है। बहरहाल, कबीर के खिलाफ यह कार्रवाई 22 अगस्त, 2012 को हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट के वकील मनोहर लाल शर्मा की इस याचिका में आठ लोगों को प्रतिवादी बनाया गया था, इनमें अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया के अलावा गृहमंत्रालय और फोर्ड फाउंडेशन भी शामिल है। केन्द्र सरकार को तीन महीने में जवाब देना था जो अवधि अगस्त महीने में पूरी हो चुकी। सरकार की तरफ से कोई जवाब नही आया। यहां सवाल ये उठता है कि केन्द्र सरकार अरविंद केजरीवाल के मामले में इतनी उदासीन क्यों है? इस सवाल के जवाब में यचिकाकर्ता मनोहरलाल शर्मा कहते है “ केन्द्र सरकार अरविंद केजरीवाल को इसलिए बचा रही है क्योंकि अरविंद केजरीवाल की मुहिम से कांग्रेस अपना राजनैतिक फायदा देख रही है” 
मनोहरलाल शर्मा यही नही रुकते वो कहते हैं “ कांग्रेस सरकार के लिए अरविंद केजरीवाल अगर मुसीबत होते तो बाबा रामदेव और नितिन गडकरी की तरह ही जांच होती और अदालत में सरकार अपना पक्ष रख चुकी होती।” कुछ लोग यह भी मान रहे हैं कि कांग्रेस अरविंद केजरीवाल को आगे कर नरेंद्र मोदी की हवा का रुख बदलने की कोशिश कर रही है।
शर्मा कहते है “ केजरीवाल की भ्रष्टाचार भगाने की मुहिम फोर्ड फाउंडेशन के पैसे से चल रही है, फोर्ड फाउंडेशन अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का फ्रंटल ऑर्गेनाइजेशन है जो दुनिया के कुछ देशों में सिविल सोसाइटी नाम से मुहिम चला रहा है।” शर्मा के मुताबिक फोर्ड फाउंडेशन कई देशों में सरकार विरोधी आंदोलनों को समर्थन देता रहा है। साथ ही आर्थिक सहयोग भी मुहैया कराता है। इसी रास्ते उन देशों में अपना एजेंडा चलाता है। केजरीवाल और उनकी टीम के अन्य सदस्य संयुक्त रूप से फोर्ड फाउंडेशन से आर्थिक मदद लेते रहे हैं।
शर्मा ने आगे कहा कि केजरीवाल ने खुद स्वीकारा है कि उन्होंने फोर्ड फाउंडेशन, डच एम्बेसी और यूएनडीपी से पैसे लिए हैं। फाउंडेशन की वेबसाइट के मुताबिक 2011 में केजरीवाल व मनीष की ‘कबीर’ नामक संस्था को करीब दो लाख अमेरिकी डॉलर का अनुदान मिला था। फॉरेन कॉन्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट-2010 के मुताबिक विदेशी धन पाने के लिए भारत सरकार की अनुमति लेना और राशी खर्च करने के लिए निर्धारित मानकों का पालन करना जरूरी होता है, लेकिन टीम केजरीवाल के सदस्यों ने नियमों का पालन नहीं किया”
ये सवाल भी लोग पूछ रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल आखिर 20 सालों तक दिल्ली में ही कैसे नौकरी करते रहे? जबकि राजस्व अधिकारी को एक निश्चित स्थान व पद पर तीन वर्ष के लिए ही तैनात किया जा सकता है। अरविंद की पत्नी पर भी उनके महकमें की कृपा रही। ऐसे में सवाल तो उठेंगे ही, क्योंकि अशोक खेमका, नीरज कुमार और अशोक भाटिया जैसे अधिकारियों की हालत जनता देख रही है। अशोक खेमका को 19 साल की नौकरी में 43 तबादलों का सामना करना पड़ा है। नीरज कुमार को 15 साल के कैरियर में 15 बार इधर-उधर किया गया है। 

शीला दीक्षित के राजनीतिक ‘भिंडरवाले’
नई दिल्ली |  बिना जनादेश के अरविंद केजरीवाल सत्ता लालसा की असुर राजनीति फैला रहे हैं। उनको लगता है कि झाडू चलने पर थोड़ी धूल तो उड़ेगी ही। फिर आसमान साफ हो जाएगा।
अरविंद केजरीवाल विचारों की इमानदारी पर फेल हो चुके हैं। कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का विचार ही अपने आपको धोखा देना है। जो राजनीतिक नेता अपने आप को धोखा देता है, वह लोगों की नजरों में हमेशा के लिए गिर जाता है। इसके उदाहरण गिनाने हों तो केंद्र में चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, एच.डी. देवगौडा, इंद्रकुमार गुजराल के नाम काफी हैं।
दिल्ली की हवा में प्रदूषण तो पहले ही था, पर राजनीति में जहर नहीं था। हवा के प्रदूषण का प्रमाण शीला दीक्षित की सरकार की एक रिपोर्ट से मिलता है। उसमें सांस संबंधी बीमारियों का आकंड़ा है। ‘2005 में पर्यावरण और प्रदूषण के चलते सांस की बीमारियों से 6 हजार 14 मोतें हुई थी। अगले साल यानी 2006 में यह संख्या बढ़कर 9 हजार 164 दिल्ली वासी मोत के शिकार हुए।’ अरविंद केजरीवाल आम आदमी की ओट में जो राजनीति कर रहे हैं, वह सारे देश में लोकतंत्र को बीमार बनाने वाला है।
कैसे? इस तरह कि वे अपने कहे के प्रति ईमानदार नहीं हैं। लेकिन लड़ाई वे बेइमानी के खिलाफ लड़ने के लिए मैदान में उतरे थे। पैसे रुपए की बेइमानी से अधिक खतरनाक वचनबद्धता से डिगना होता है। जो अरविंद केजरीवाल इस समय कर रहे हैं।
इसे कहां से शुरू करें? रामलीला मैदान में जनलोकपाल के लिए आंदोलन छिड़ा। जिसपर उन्होंने डींग मारी कि यह ‘व्यवस्था परिवर्तन’ का आंदोलन है। लोगों ने मान लिया कि वे सच कह रहे थे। तभी मुझे यह सूचना मिल गई थी कि अरविंद दलीय राजनीति में उतरने का इरादा बना रहे हैं। यही कारण था कि अनेक बार उनके बुलावे और मित्रों के आग्रह के बावजूद उस मंच पर जाने की इच्छा नहीं हुई। व्यवस्था परिवर्तन की उनकी समझ क्या है, इसे उनके बदलते बयानों से समझा जा सकता है। क्या राजनीतिक दल बनाकर वे उसी रास्ते पर नहीं चल पड़े हैं जिसपर कभी जनता पार्टी चली थी? जनता पार्टी के किसी नेता ने तब व्यवस्था परिवर्तन का वादा नहीं किया था। हां, जेपी ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा देकर उसे हवा दी थी।
भ्रष्टाचार का राजनीतिकीकरण करते हुए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पहले जनमोर्चा बनाया और फिर जनता दल। जनमोर्चा के ही दिनों में एक दिन चेन्नई से पेरूंदुराई जाते हुए विश्वनाथ प्रताप सिंह से सवाल किया कि आप पार्टी कब बना रहे हैं? थोड़ी देर सोचकर उन्होंने जो जवाब दिया, वह उनकी राजनीतिक ईमानदारी का सबूत था। उसे अगली सीट पर बैठे विध्याचरण शुक्ल और पीछे बैठे संतोष भारतीय ने भी सुना। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कभी व्यवस्था परिवर्तन का नारा नहीं दिया। लेकिन उनसे इसकी उम्मीद जरूर की जाती थी। उन्हें अगर अवसर मिलता तो वे प्रयास करते और वह भी बिना ढोल बजाए।
अरविंद केजरीवाल और उनकी गोल के साथी राजनीतिक टोटकेबाजी में पड़ गए हैं। यह समझे बगैर कि राजनीतिक दल रातों-रात नहीं बनते और बन भी जाते हैं तो ज्यादा दिनों तक चलते नहीं। अरविंद केजरीवाल पर यह आपत्ति नहीं की जानी चाहिए कि उन्होंने अन्ना आंदोलन को भुनाने के लिए राजनीतिक दल क्यों बनाया? यह उनका अधिकार है। पर उससे ज्यादा बड़ा अधिकार दिल्ली की जनता के पास है। उनकी पार्टी चुनाव लड़ी। अनुमान से अधिक सीटें पा सकी। यहां तक तो ठीक है। चुनाव परिणाम के बाद बड़ी मासूमियत से वे बोले कि ‘मैं आम आदमी हूं। मैं प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पद की दौड़ में नहीं हूं।’
चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल ने बयान दिया कि ‘मैं अपने बच्चों की कसम खाता हूं कि कांग्रेस और भाजपा से गठजोड़ नहीं करूंगा।’ चुनाव से पहले के उनके खास-खास वायदों को लोग गांठ बांधकर याद रखे हुए हैं। इसलिए उनका यहां उल्लेख अनावश्यक है। अरविंद केजरीवाल विचारों की इमानदारी पर फेल हो चुके हैं। कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का विचार ही अपने आपको धोखा देना है। जो राजनीतिक नेता अपने आप को धोखा देता है, वह लोगों की नजरों में हमेशा के लिए गिर जाता है। इसके उदाहरण गिनाने हों तो केंद्र में चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, एच.डी. देवगौडा, इंद्रकुमार गुजराल के नाम काफी हैं।
अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के बिछाए जाल में फंस चुके हैं। संदीप दीक्षित से उनका एनजीओ का नाता चर्चित रहा है। सवाल भी उठते रहे हैं। वे अपनी राजनीतिक नासमझी में यह साबित करने जा रहे हैं कि वे शीला दीक्षित के बनाए राजनीतिक ‘भिंडरवाले’ हैं। इंदिरा गांधी को ‘भिंडरवाले’ के सफाए के लिए सेना भेजनी पड़ी थी। शीला दीक्षित का काम एक बयान से ही चल जाएगा। उनका पहला बयान अरविंद केजरीवाल को एक चेतवानी है। शीला दीक्षित ने साफ कर दिया है कि ‘कांग्रेस बिना शर्त समर्थन नहीं दे रही है।’
चंद्रशेखर को कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन दिया था। कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने पूछे जाने पर कहा था कि ‘चंद्रशेखर की सरकार को विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार से कम से कम एक महीना ज्यादा चलाएंगे।’ यह पुराने इतिहास की घटना नहीं है, सिर्फ 14 साल पहले की है। कांग्रेस ने चार महीने भी नहीं दिए। अरविंद केजरीवाल से साफ-सुथरे राजनीतिक फैसले के लिए लोग डा. हर्षबर्धन को याद करेंगे।
जनादेश को समझने और सत्ता की लालसा से दूर रहने का उन्होंने एक उदाहरण बनाया है। प्रकृति और राजनीति के नियम मनमाने ढंग से निर्धारित नहीं किए जा सकते। जिसे अरविंद केजरीवाल करते दिख रहे हैं।

केजरीवाल का सच बताती पत्रिका
नई दिल्ली |  खेल के नियम बदलने की वाहवाही जिस अरविंद केजरीवाल को दी जा रही है, उनकी एक अलग दास्तान भी है। उसे खोजकर ‘यथावत’ पत्रिका ने छापा है। पत्रिका में अमेरिकी महिला शिमिरित की चर्चा है, जिसने ‘कबीर’ संस्था के लिए रिपोर्ट तैयार की थी।
“केजरीवाल के अतीत को समझे बगैर उनकी रणनीति और राजनीतिक महत्वाकांक्षा को ठीक-ठीक नहीं समझा जा सकता है।यथावत पत्रिका में जो रिपोर्ट आ रही है, उसमें इसी बात को समझाने की कोशिश हुई है।”-- राकेश सिंह, पत्रकार
‘यथावत’ पत्रिका ने केजरीवाल की इस दास्तान को कवर स्टोरी बनाया है। साथ ही आवरण पर लिखा है, “केजरीवाल के पीछे कौन?” पत्रिका ने इसे एक सनसनीखेज मामला बताते हुए कहा है कि क्या यह अज्ञात है ? ऐसा नहीं है। इसे सिर्फ खोजने की जरूरत है। राकेश सिंह ने ‘यथावत’ पत्रिका के लिए यही किया है।  
इस बाबत पत्रकार राकेश सिंह ने ‘द पत्रिका’ से बातचीत में कहा है, “अरविंद केजरीवल और उनके साथी दिल्ली की सरकार चलाने में व्यस्त हैं। पर, उनका एक अतीत भी है, जिसमें एनजीओ और उनके सहयोगियों का मजबूत गठजोरड़ है। उसे समझने की जरूर है।”
राकेश सिंह आगे कहते हैं, “केजरीवाल के अतीत को समझे बगैर उनकी रणनीति और राजनीतिक महत्वाकांक्षा को ठीक-ठीक नहीं समझा जा सकता है।यथावत पत्रिका में जो रिपोर्ट आ रही है, उसमें इसी बात को समझाने की कोशिश हुई है।”
यथावत ने राकेश सिंह की रिपोर्ट को कवर स्टोरी बनाया है। स्टोरी में उन सूत्रों से पर्दा उठाने का दावा किया गया है, जिससे यह भ्रम पैदा होता है कि कहीं अरविंद केजरीवाल अमेरिकी मोहरे तो नहीं।

इमरान खान की भूमिका में अरविंद केजरीवाल?
नई दिल्ली |  क्या अमेरिका अरविंद केजरीवाल की जरूरत ठीक उसी तरह समझ रहा है, जैसी पाकिस्तान में उसे इमरान खान की थी? यह समझने के लिए अरविंद की पृष्ठभूमि को जानना होगा।
कबीर, शिमिरित ली और फोर्ड के अलावा कुछ भारतीय उद्योगपति भी इस मुहिम में शामिल हैं। इंफोसिस के मुखिया और फोर्ड फाउंडेशन के सदस्य नारायण मूर्ति ने भी 2008-2009 में हर साल 25 लाख रुपए की आर्थिक मदद केजरीवाल की संस्था को दी थी। 2010 में जब शिमिरित कबीर से जुड़ीं तो नारायणमूर्ति ने मदद 25 लाख रुपए से बढाकर 37 लाख रुपए कर दी।
एक-एक कर तार जुड़ रहे हैं। भारत सहित पूरे एशिया में फोर्ड की सियासी सक्रियता को समझने की बात कही जा रही है। इसकी पहचान एक अमेरिकी संस्था की है। दक्षिण एशिया में फोर्ड की प्रमुख कविता एन. रामदास हैं। वह एडमिरल रामदास की सबसे बड़ी बेटी हैं।
एडमिरल रामदास अरविंद केजरीवाल के गॉडफादर हैं। केजरीवाल के नामांकन के समय भी एडमिरल रामदास केजरीवाल के साथ थे। एडमिरल रामदास की पत्नी लीला रामदास ‘आप’ के विशाखा गाइडलाइन पर बनी कमेटी की प्रमुख बनाई गई हैं।
रामदास को भी मैगसेसे पुरस्कार मिला है। यहां सवाल उठता है कि क्या एडमिरल रामदास और उनका परिवार फोर्ड के इशारे पर अरविंद केजरीवाल की मदद कर रहा है? एशिया की सियासत में फोर्ड की सक्रियता इस उदाहरण से भी समझी जा सकती है। फोर्ड फाउंडेशन के अधिकारी रहे गौहर रिजवी अब बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के सलाहकार के तौर पर काम कर रहे हैं।
कबीर, शिमिरित ली और फोर्ड के अलावा कुछ भारतीय उद्योगपति भी इस मुहिम में शामिल हैं। इंफोसिस के मुखिया और फोर्ड फाउंडेशन के सदस्य नारायण मूर्ति ने भी 2008-2009 में हर साल 25 लाख रुपए की आर्थिक मदद केजरीवाल की संस्था को दी थी। 2010 में जब शिमिरित कबीर से जुड़ीं तो नारायणमूर्ति ने मदद 25 लाख रुपए से बढाकर 37 लाख रुपए कर दी।
यही नहीं, इंफोसिस के अधिकारी रहे बालाकृष्णन ‘आम आदमी पार्टी’ में शामिल हो गए। इनफोसिस से ही नंदन नीलेकणी भी जुड़े हैं। नीलेकणी ‘बायोमेट्रिक आधार’ परियोजना के अध्यक्ष भी हैं। आम आदमी पार्टी की दिल्ली में सरकार बनते ही ‘आधार’ को जरूरी बनाने के लिए केजरीवाल ने कदम बढ़ा दिया है। ‘आधार’ और उसके नंदन को कुछ इस तरह समझा जा सकता है।float: left; margin-right: 20px;
जानकारी के मुताबिक नवंबर 2013 में न्यूयार्क की कंपनी मोंगाडीबी नंदन नीलेकणी के ‘आधार’ से जुडती है। इस कंपनी को आधार के भारतीय नागरिकों का डाटाबेस तैयार करने का काम दिया गया है। मैंगाडीबी की पड़ताल से कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। इस कंपनी में इन-क्यू-टेल नाम की एक संस्था का पैसा लगा है। इन-क्यू-टेल सीआईए का ही वित्तीय संगठन है।
यहां अब नंदन नीलेकणी और दिल्ली चुनाव के बीच संबंध को देखने की भी जरूरत है। दिल्ली चुनाव के दौरान अमेरिका से भारत एक मिलयन फोन आए। कहा गया कि यह आम आदमी पार्टी के समर्थन में आए। लेकिन यहां कई सवाल उठते हैं। पहला सवाल, इसे भारत से जुड़े लोगों ने किए या फिर किसी अमेरिकी एजेंसी ने किए? दूसरा सवाल है दिल्ली के लोगों के इतने फोन नंबर अमेरिका में उपलब्ध कैसे हुए? यहीं नंदन नीलेकणी की भूमिका संदेह के घेरे में आती है।
दरअसल नंदन नीलेकणी जिस ‘आधार’ के अध्यक्ष हैं, उसमें फोन नंबर जरूरी है। इतने ज्यादा फोन नंबर सिर्फ नंदन नीलेकणी के पास ही संभव हैं। यही कारण है कि केजरीवाल की सरकार बनने के बाद दिल्ली के लोगों से ‘आधार’ नंबर मांगे जा रहे हैं। जब अदालत ‘आधार’ को जरूरी न मानते हुए अपना फैसला सुना चुकी है तो केजरीवाल सरकार आधार नंबर क्यों मांग रही है। आखिर उसकी मजबूरी क्या है? इस मजबूरी को इंफोसिस प्रमुख और फोर्ड के रिश्ते से समझा जा सकता है। 

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