Tuesday, January 14, 2014

आम आदमी पार्टी का स्टाल

via विशाल अग्रवाल

पिछले कुछ दिनों के अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर एक बात मैं पूरे दावे से कह सकता हूँ कि आम आदमी पार्टी के वालियंटर्स को जितना आसान लोगो को खुद से जोड़ना लग रहा है, उससे भी ज्यादा आसान लोगों को इससे दूर करना है। अभी अधिकांश लोग इस पार्टी के सम्बन्ध में किसी निश्चित विचार पर नहीं पहुंचे हैं और दूसरों से सुनी हुयी बातों और चर्चाओं के आधार पर अपना मत बना रहे हैं। यही सही मौक़ा है इस पार्टी की बखिया उधेड़ने का और लोगों के सामने इसकी सच्चाई लाने का क्योंकि जब तक रंग नहीं चढ़ा है तब तक आपके पास अपना रंग चढाने का पूरा मौका है पर एक बार किसी और का रंग चढ़ गया तो उस रंग को उतार कर अपना रंग चढ़ाना इतना आसान नहीं होता।

आज दोपहर में अपने दो तीन मित्रों के साथ कहीं जाते समय देखा कि एक जगह स्टाल लगाये हुए कुछ लोग आम आदमी पार्टी का सदस्यता अभियान चला रहे हैं। भीड़ भी ठीकठाक थी और काफी लोग मजमा लगाये खड़े थे। लोगों को जागरूक करने का सही मौका और जगह देख कर मैं उन मित्रों के साथ स्टाल पर पहुंचा और पार्टी का सदस्य बनने की इच्छा जतलाते हुए उनसे थोड़ी जानकारी देने का आग्रह किया। उन लोगों द्वारा हां कहते ही मैंने आम आदमी पार्टी की विदेश नीति, सुरक्षा नीति, आतंकियों और नक्सलियों के प्रति नीति, कश्मीर नीति, बँगलादेशी घुसपैठियों पर नीति, अशांत क्षेत्रों में सेना तैनाती पर नीति आदि विषयों पर सवाल करना शुरू कर दिया। पार्टी वालियंटर्स के ये कहने पर कि इन सभी मुद्दों पर अभी हमारी पार्टी ने कोई राय नहीं बनायीं है और हमारा एक ही एजेंडा है-भ्रस्टाचार समाप्त करना, मैंने प्रतिप्रश्न किया कि अगर देश हित से सम्बंधित मुद्दों पर कोई नीति ही नहीं है तुम्हारी पार्टी की तो लोकसभा में मुद्दे क्या नगरपालिका और ग्राम पंचायत वाले उठाओगे। अरे, जब राष्ट्रीय मुद्दों पर कोई नीति ही नहीं है आम आदमी पार्टी की तो क्यों ना माना जाये कि ये लोकसभा चुनाव तुमलोग कांग्रेस की मिलीभगत से केवल मोदी जी को रोकने के लिए लड़ रहे हो।

उन वालियंटर्स के पास कोई जवाब नहीं था और वो कुछ रटे रटाये उत्तर देते रहे और गूँ गूँ करते रहे। मुझे जवाब चाहिए भी कहाँ थे उनसे। हाँ, जो चाहिए था, वो उद्देश्य पूरा हो गया और देखते देखते लोग आपस में बात करते हुए और मन में इस पार्टी के सम्बन्ध में कुछ प्रश्न लेकर तितिर बितिर हो गए। मैं भी वहाँ से निकल लिया, इस संकल्प के साथ कि आगे फिर यही करना है, जहाँ भी और जब भी इस पार्टी का प्रचार होते देखना है। हालाँकि कोई फायदा नहीं पर फिर भी इतनी इल्तिज़ा भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं से भी कहूँगा कि आलस छोड़कर थोडा सा सक्रिय हो जाओ और जनता से सीधे जुड़कर इस पार्टी को अपनी पैठ बनाने से रोक लो वरना कुछ ना कुछ तो नुकसान पहुँचा ही देगी।

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