Monday, January 13, 2014

अरविंद केजरीवाल का उभार और अमेरिका का हथियार बाजार!

अरविंद केजरीवाल का उभार और अमेरिका का हथियार बाजार!

संदीप देव, नई दिल्‍ली। दिन-रात दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल व उनकी आम आदमी पार्टी की लॉबिंग में देश की इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया जुटी हुई है। ऐसा भी नहीं है कि अरविंद केजरीवाल की तरह देश में पहले किसी नई राजनैतिक पार्टी या व्‍यक्ति का उभार न रहा हो, बल्कि मैं तो यह कहना चाहूंगा कि जब 24 घंटे कैमरे का छाता नहीं तना रहता था तब असमगण परिषद जैसी पाटियां सीधे छात्रों के होस्‍टल से निकल कर सत्‍ता की कुर्सी तक पहुंची थी! तो आखिर ऐसी क्‍या वजह है कि इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया का 'केजरी राग' रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है? दरअसल इसके लिए आपको अमेरिका और उसकी खुफिया एजेंसी सीआईए की पूरी कार्यप्रणाली को समझना होगा, जो दुनिया के हर देश के लोकतंत्र को अपने हथियार बाजार के लिए बंधक बनाने का खेल प्रथम विश्‍व युद्ध के समय से ही खेल रहा है! आर्थिक महाशक्ति अमेरिका की पूरी इकोनोमी का 60 फीसदी हिस्‍सा हथियारों के निर्यात पर निर्भर है। मेरे पहले लेख,'कैसे और क्‍यों बनाया अमेरिका ने अरविंद केजरीवाल को, पढि़ए पूरी कहानी!' में आप अरविंद केजरीवाल, आम आदमी पार्टी और अमेरिका के बीच एक संदिग्‍ध रिश्‍ते की जानकारी हासिल कर चुके हैं। इस लेख में ऐतिहासिक तथ्‍यों के साथ इसके मूल कारण को समझाने का प्रयास किया है...  
अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए(CIA) की कार्यप्रणाली का एक बड़ा हिस्‍सा पूरी दुनिया की मीडिया को मैनेज करने का है। आपको तो याद होगा कि केवल मीडिया रिपोर्ट को आधार बनाकर इराक पर युद्ध थोप दिया गया था जबकि युद्ध के बाद वहां किसी भी तरह का रासायनिक हथियार नहीं मिला था। और यह साबित हो गया था कि अमेरिका ने इराक पर केवल युद्ध थोपने के लिए मीडिया को कैसे मैनेज किया था। दुनिया के सभी बड़े मीडिया हाउस में फंडिंग से लेकर, किसी मीडिया हाउस के शेयर खरीदने और उसे प्रभावित करने का तरीका अमेरिका ने अपने ही देश के फोर्ड मोटर कंपनी और आज दुनिया भर में अमेरिकी हित को स्‍थापित करने में जुटे फोर्ड फाउंडेश्‍न के संस्‍थापक हेनरी फोर्ड से सीखा था।
वर्तमान में सीआईए ने पूरी दुनिया में फंडिंग और पुरस्‍कार के नाम पर बहुत सारे एनजीओ, ट्रस्‍ट और व्‍यक्ति पाल रखे हैं, जो अपने-अपने देश की सरकारी योजनाओं को प्रभावित करने और लोकतंत्र को बंधक बनाने का खेल खेलते हैं ताकि अमेरिकी हित सधता रहे। इसके लिए अमेरिका, नीदरलैंड और स्‍वीडन- ये तीन देश मिलकर फोर्ड फाउंडेशन, रॉकफेलर ब्रदर्स फंड, आवाज, हिवोस, पनोस  जैसी फंडिंग एजेंसियों के माध्‍यम से फंडिंग का खेल खेल रही हैं।  आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि भारत में अरविंद केजरीवाल को 'रेमॉन मेग्‍सेसाय' पुरस्‍कार देकर नायक बनाने वाले और उनकी एनजीओ को फंडिंग करने वाले फोर्ड फाउंडेशन ने तो अपने हथियार उद्योग को बढ़ावा देने के लिए द्वितीय विश्‍व युद्ध में हिटलर के पक्ष में जबरदस्‍त मीडिया लॉबिंग की थी। बकायदा हिटलर की तानाशाही को जायज ठहराने के लिए हेनरी फोर्ड ने एक बड़े अखबार 'द डर्बन इंडिपेंडेंट' को ही खरीद लिया था!
'रेमॉन मेग्‍सेसाय' पुरस्‍कार और फंडिग का यह सारा खेल हथियार बाजार से जुड़ा है! 
जर्मन तानाशाह हिटलर ने अपनी जीवनी 'मैन कॉम्‍फ' में फोर्ड मोटर कंपनी के संस्‍थापक हेनरी फोर्ड का बकायदा जिक्र किया है और उसे अपना आदर्श बताया है। हेनरी फोर्ड एक मात्र अमेरिकी है, जिसका जिक्र हिटलर ने अपनी जीवनी में किया है। हेनरी फोर्ड की कंपनी द्वितीय विश्‍व युद्ध में नाजी जर्मनी को हथियारों की आपूर्ति करने वाली प्रमुख कंपनी थी। प्रथम विश्‍व युद्ध के समय ही फोर्ड प्रमुख हथियार आपूर्ति करने वाली कंपनी के रूप में स्‍थापित हो चुकी थी। द्वितीय विश्‍व युद्ध में जब अमेरिका ने प्रवेश किया तो फोर्ड कंपनी ने मिसिगन में लड़ाकू विमानों को बनाने के लिए बकायदा इंडस्‍ट्री ही शुरू कर दिया था। दुनिया का सबसे बड़ा और पहला बमवर्षक विमान बी-24 को फोर्ड ने ही बनाया था, जिसके जरिए अमेरिका ने द्वितीय विश्‍व युद्ध में जीत हासिल की थी। द्वितीय विश्‍व युद्ध में अमेरिका के लिए बी-24 बम वर्षक विमान बनाने के लिए 18 हजार से अधिक इंडस्‍ट्री स्‍थापित की गई थी, जिसमें आधे से अधिक फोर्ड कंपनी की थी।
फोर्ड कंपनी अपने 'फोर्ड फाउंडेशन' के माध्‍यम से पूरी दुनिया में पुरस्‍कार, फंडिंग और मीडिया के जरिए जो खेल खेलती है, वह दरअसल अपने हथियार और कार बाजार को बढ़ावा देने के लिए खेलती है! एशिया उसके लिए बड़ा हथियार और कार बाजार है। दक्षिण एशिया में 'रेमॉन मेग्‍सेसाय' पुरस्‍कार देकर और लोकतंत्र और सरकारी योजनाओं को प्रभावित करने वाले NGO व व्‍यक्तियों को फंडिंग कर FORD इस खेल को अंजाम तक पहुंचाती है। केवल एनजीओ से जब बड़े पैमाने पर हित नहीं सध रहा था तो वर्ष 2000 में फोर्ड ने' रेमॉन मेग्‍सेसाय' पुरस्‍कार की श्रेणी में 'उभरता नेतृत्‍व' अतिरिक्‍त रूप से जोड़ दिया था। आपको याद है न कि अरविंद केजरीवाल को उभरते नेतृत्‍व के लिए ही वर्ष 2006 में 'रेमॉन मेग्‍सेसाय' पुरस्‍कार मिला था? जबकि उस वक्‍त तक केजरीवाल ने भ्रष्‍टाचार के खिलाफ जनलोकपाल आंदोलन की शुरूआत भी नहीं की थी! आपको यह भी बता दूं कि रेमॉन मेग्‍सेसाय' पुरस्‍कार का गठन फोर्ड के साथ एक और अमेरिकी कंपनी रॉकफेलर ब्रदर्स फंड ने मिलकर किया था। रॉकफेलर का भी आपराधिक इतिहास है, जो आपको अगले किसी लेख में बताऊंगा।

यहूदियों के नरसंहार से बढ़ रहा था हथियार बाजार, फोर्ड ने संभाल रखा था हिटलर का प्रचार! 
द्वितीय विश्‍व युद्ध में अपने हथियारों की बिक्री को बढ़ाने के लिए हेनरी फोर्ड ने न केवल नाजी जर्मनी को सपोर्ट किया था, बल्कि अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर हिटलर की तानाशाही और यहूदी नरसंहार को जायज ठहराने के लिए बकायदा अखबार तक निकाल दिया था। हिटलर ने जब यहूदियों का नरसंहार किया था तब उसके पक्ष में पूरी दुनिया में माहौल बनाने के लिए फोर्ड के संस्‍थापक हेनरी फोर्ड ने पानी की तरह पैसा बहाया था।  हिटलर ने अपनी आत्‍मकथा में लिखा है, ''मैं हेनरी फोर्ड का सम्‍मान करता हूं और उससे प्रेरित हूं। मैं जर्मनी में उनकी समूची अवधारणा को लागू करना चाहता हूं।'' हेनरी फोर्ड को अपना आदर्श मानने वाला जर्मन तानाशाह हिटलर 'फोर्डिज्‍म' की अवधारणा को पूरी दुनिया पर लागू करना चाहता था। क्‍या आप जानते हैं कि यह फोर्डिज्‍म की अवधारणा क्‍या है? बिजनस के लहजे में कहें तो पूरी दुनिया में फोर्ड के बाजार का विस्‍तार और प्रचार। बाजार, पुरस्‍कार और फंडिंग के जरिए 'फोर्डिज्‍म' के इस फैलाव पर दुनिया के प्रबंधन संस्‍थानों में बकायदा शोध चलता है।   
हिटलर की तानाशाही को तार्किक रूप से सही ठहराने के लिए फोर्ड कंपनी के मालिक हेनरी फोर्ड ने एक साप्‍ताहिक अखबार 'द डर्बन इंडिपेंडेंट' को फंड मुहैया कराया था। वर्ष 1918 में हेनरी फोर्ड के निजी सचिव अर्नेस्‍ट लेबोल्‍ड ने इस साप्‍ताहिक अखबार को खरीदा था। 'द डर्बन इंडिपेंडेंट' अखबार ने लगातार लेख लिखकर हिटलर का पक्ष लेते हुए यहूदियों के नरसंहार को जायज ठहराया था। वर्ष 1920 से 1927 तक अधिसंख्‍य देश में फोर्ड कंपनी का विस्‍तार हो चुका था। फोर्ड अपने फ्रेंचाइजी के माध्‍यम से हर देश में इस अखबार को पहुंचा रहा था और हिटलर के पक्ष में जनमत तैयार करने की कोशिश कर रहा था। 'द डर्बन इंडिपेंडेंट' अखबार की पाठक संख्‍या उस जमाने में 7 से 8 लाख के करीब पहुंच गई थी, जिसके जरिए नाजी जर्मनी को सही ठहराया जा रहा था, जिसके बल पर उसके हथियरों की बिक्री लगातार बढ़ रही थी। हेनरी फोर्ड के इस काम से हिटलर बहुत प्रसन्‍न हुआ और उसने फोर्ड को जर्मनी का सबसे बडा नागरिक सम्‍मान 'ग्रांड क्रॉस ऑफ द जर्मन ईगल' से सम्‍मानित किया था। यहूदियों के नरसंहार को जायज ठहराने वाली फोर्ड कंपनी द्वारा फंडेड पुस्‍तक 'द इंटरनेशनल ज्‍यू, द वर्ल्‍डस फॉरमोस्‍ट प्रॉब्‍लम' को जब आप पढेंगे तो पाएंगे कि कि फोर्ड अपने बिजनस को बढ़ाने के लिए किस तरह से यहूदियों के प्रति घृणा का प्रचार कर रहा था!  
मीडिया को कब्‍जे में लेना 1908 में ही सीख लिया था हेनरी फोर्ड ने
हेनरी फोर्ड को मीडिया की ताकत का अंदाजा वर्ष 1908 में ही हो गया था जब उसने अपनी पहली कार के 'मॉडल टी' को लॉंच किया था। अमेरिकी मध्‍यवर्ग में इस गाड़ी को लोकप्रिय बनाने के लिए उसने अमेरिका के हर अखबार में विज्ञापन दिया था और उसी के बल पर हर अखबार में न्‍यूज भी छपवाई थी। बड़े-बड़े संपादकीय तक लिखे गए थे फोर्ड के पक्ष में। यह वह दौर था जब मीडिया का इतना उफान नहीं था, लेकिन दुनिया ने देखा कि हेनरी फोर्ड ने मीडिया की बदौलत अपनी पहली कार 'मॉडल टी' को पूरे अमेरिका में लोकप्रिय करा लिया था और 1918 आते-आते अमेरिका के कुल कार बाजार का 50 फीसदी फोर्ड के कब्‍जे में आ गया। हिटलर के पक्ष में अपने मीडिया मैनेजमेंट के इसी हुनर को अपनाना चाहा, लेकिन नरसंहार एक बड़ा मुददा था, जिसके पक्ष में सीधे-सीधे नहीं लिखा जा सकता था इसलिए फोर्ड ने हिटलर के लिए एक अखबार 'द डर्बन इंडिपेंडेंट' को फंड कर उसे खरीद लिया।
अपने फंड के बल पर मीडिया मैनेज करने की हेनरी फोर्ड की ताकत से तत्‍कालीन अमेरिकी राष्‍ट्रपति वाड्रो विल्‍सन बहुत प्रभावित हुए थे। उन्‍होंने प्रथम विश्‍व युद्ध की समाप्ति के बाद गठित राष्‍ट्रसंघ में न केवल हेनरी फोर्ड को प्रवेश दिलाया, बल्कि मीडिया ताकत का इस्‍तेमाल करते हुए राष्‍ट्र संघ को शांति के संघ के रूप में पूरी दुनिया में स्‍थापित करने का काम भी हेनरी फोर्ड को सौंपा था। वर्ष 1919 में हेनरी फोर्ड ने पूरी दुनिया की मीडिया को अपने पैसे की ताकत का अहसास कराया और राष्‍ट्रसंघ के पक्ष में माहौल तैयार किया। अपने आखिरी दिनों में हेनरी फोर्ड ने कहा था,''अपने व्‍यवसाय के जरिए अमेरिका को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना ही फोर्ड कंपनी का मकसद है।'' आज अमेरिका को मजबूत बनाने के लिए फोर्ड फाउंडेशन दूसरे देशों के लोकतंत्र को वहां के व्‍यक्तित्‍व, एनजीओ, योजनाकार और मीडिया के बल पर ही बंधक बनाता चला जा रहा है!
भारत में कौन हैं, जो फोर्ड के पैसे पर पल रहे हैं?
भारत में 'रेमॉन मेग्‍सेसाय' पुरस्‍कार प्राप्‍त करने वाले और फोर्ड से फंड पाने वाले अधिकांश चेहरों व संस्‍थाओं और उनकी गतिविधियों को देख लीजिए! इनमें से अधिकांश आपको कश्‍मीर में अलगाववाद की वकालत करने वाले, माओवादियों के समर्थक और आतंकवाद के पैरोकार मिलेंगे। अमेरिका भारत पर सीधे युद्ध नहीं थोप सकता है, इसलिए कश्‍मीर, आतंकवाद और माओवाद यहां हथियारों की बिक्री का बाजार उपलब्‍ध कराता है, जो सीधे तौर पर अमेरिकी अर्थव्‍यवस्‍था को मजबूत बनाता है। इसलिए अमेरिका नहीं चाहता कि कश्‍मीर समस्‍या कभी हल हो। इसकी वजह से वह पाकिस्‍तान को भी हथियार का बाजार बनाए हुए है।
केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के अधिकांश चेहरों को देखिए, इनमें से कई पहले किसी न किसी सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों से जुड़े थे और उसे प्रभावित करते रहे थे, लेकिन आज अरविंद के नेतृत्‍व में इनकी अपनी सरकार है! तभी तो खुले रूप में प्रशांत भूषण कश्‍मीर और नक्‍सल इलाके में जनमत संग्रह की बात कर रहे हैं। प्रशांत अप्रत्‍यक्ष तौर पर गृहयुद्ध की वकालत कर रहे हैं। इसमें उनके जनमत संग्रह से इत्‍तेफाक रखने वाले दो तरह के लोग हैं। एक वो जो हथियारों से लैस हैं और दूसरा वो जो टीवी चैनलों पर बैठकर और अखबारों में लिखकर उसके पक्ष में माहौल तैयार करते हैं। यह सब फोर्ड और अमेरिका के हथियार उद्योग को खूब रास आ रहा है। 

No comments:

Post a Comment

शंकराचार्य और सरसंघचालक एक_तुलनात्मक_अध्ययन

वरिष्ठ आईपीएस चाचाजी  श्री Suvrat Tripathi की कलम से। #शंकराचार्य_और_सरसंघचालक_एक_तुलनात्मक_अध्ययन सनातन धर्म की वर्णाश्रम व्यवस्था के ...